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आश्वास
मूनाराधना
वारंवार शरीर ग्रहण करना व त्यागना इसको द्रव्यसंसार कहते हैं, पहिले नरकम सात धनुष्य, तीन हाथ और छह अंगुल प्रमाण नारकी जीवोंका शरीर होता हैं. दूसरे नरकसे सातये नरकपर्यंत नारकी जीवोंका शरीर दना दूना ऊंचा है. सातवे नरकमें नारकिओंका शरीरप्रमाण पांचसौ धनुप्यका होता है. इस तरह नारकी जीयोंके शरीरके प्रकार हैं. प्राणिऑने भूतकालमें एक एक शरीर भी अनंतबार धारण किया है. भव्य जीवोंने भूतकालमें अनंता शरीर धारण किय है, परंतु भविष्यकालमें वे अनंत शरीराको धारण करेंगे अथवा नहीं भी करेंगे. यदि थोडेहि दिनों में उनको मोक्ष प्राप्त होनेवाला होगा तो अनंत शरीर धारण नहीं करेंगे अन्यथा धारण करेंगे. अभन्यजीव भूतकालके समान भविष्यकालमें भी अनंतो शरीर धारण करेंगही. इस प्रकार स्थूलरीतिसे द्रन्यसंसारका वर्णन किया है
क्षेत्र संसारका वर्णन-सीमंतक-नरक विलसे अप्रतिष्ठ नामक नरकविलतक चौरासी लाख नरकबिलोंकी संख्या है. इन एकेक नरकविलमें भी इस जीवने भूतकालमें अनंत जन्ममरण धारण किये हैं. भव्यजीवोंके भविष्यकालमें अनंत जन्ममरण होगे ही ऐसा नियम नहीं है. अभव्यों के भविष्यकालमें भी अनंत जन्ममरण हॉग ही.
कालसंसारका वर्णन-किसी उत्सर्पिणीके प्रथम समयमें कोइ जीन प्रथमनरकमें उत्पन्न हुआ. आयुष्य समाप्त होनेपर अन्य स्थानमें उत्पन्न हुआ. पुनः कदाचित् किसी उत्सर्पिणीके दुमर समयमें प्रथम नरकमें उत्पन्न दुआ. इस प्रकारसे उत्सर्पिणीके तिसरा, चौथा, पांचवा वगैरे समयों में उसही नरकमें उत्पन्न हो होकर उत्सर्पिणीके संपूर्ण समय उसने पूर्ण किये. उत्सर्पिणीके समान अवसर्पिणीके समय क्रमसे उसही नरकमें जन्म लेकर उसने पूर्ण किये. प्रथमनरकमें जन्म लेले कर जैसे उसने उत्सर्पिणीके और अबमर्पिणीके सगय पूर्ण किये. उसी तरह उसने अन्य नरकों में भी जन्म लेकर इनके समय पूर्ण किये हैं. प्रत्येक नरको पुनः पुनः जन्म लेकर इस जीवने अनंत उत्सर्पिणी अवसर्पिणी कालको समाप्त किया है.
भवसंसारका वर्णन-प्रथम नरकमें दस हजार वर्ष प्रमाण आयु धारण करके यह जीव नारकी हुआ. पुनः क्रमसे एक समय अधिक दस हजार वर्ष आयुका धारक हुआ. ऐस एक एक समय बढ़ता हुआ यह जीव प्रथम नरकमें एकसागरोपम आयुष्य पूर्ण करता है. दूसरे नरकमें एक एक समय अधिक के क्रमसे एक सागरोपम
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