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मूलाराधना
आश्वास
मूलारा-आहारमओ अन्ने निर्वृत्त इत्र प्राणानां तन्मूलत्यात् । आहारेण भोजनत्यागेन | किलामिदो ग्लानि गतः । बिराहिदो इति पारे भोजनेन बियोजिन इत्यर्थः । अदुहन्थो आर्तदुःखातुरः । अङ्गअट्रो इति पाटे आर्त द्विवेन आतरौंद्राभ्यां कत: पीडितः ।। उक्तं च
अवमन्नमयो जीवस्त्याज्यमानोऽधसा कदा ।।
आतरौद्राकुलीभूतऋतुरंगे प्रवर्तते ॥ बहुश्रुतसूरिणा पुनः शुतोपदेश शिक्षाविशेषाभ्यां निराकृततएबुभुक्षाकामः सचानकतानो भवतीत्युपदिशतिमूलारा-उवग्गाहदो कृतोपकारः । अवक्खितो अव्यानिमः ।। कथमगीतार्थेन गुरुणा नुदादिना वाध्यमानो न चिकित्स्यते इति तदाश्रयणं प्रत्याचप्ले
गूलारा--पहमेण तृष्णापरीपहेण । दोब्त्रेण क्षुत्परीषहेण । उब्वाचितयस्स उत्कृष्ट पौड्यमानस्य उषदेमादि श्रुतरहस्यनिरूपणततधारणाचल्यादिप्रतीकार । समाधिकरणं धय॑शुक्लण्यानसाधनम् ।।
क्षापकके चतुरंगका अज्ञ आचार्य कैसा नाश करता है? इस प्रश्नका उत्तर आचार्य इस प्रकार देते हैंसंसारसायरश्मि य इस गाथासे ४३७ नंबरकी पढमेण व दोषेण व इस गाथातकका अर्थ -
हिंदी अर्थ---यह संसारसमुद्र अनंत और तीव्र दुःखरूपी पानीसे लबालब भरा है. ऐसे संसारसमुद्र में भ्रमण करनेवाले इस प्राणीको मनुष्यजन्म कष्टसे मिलता है.
___ मनुष्य जन्म मिलनपर भी उत्तम देश: कुल, जाति, रूप, आरोग्य, दीर्घायुष्य, बुद्धि, शाम्रश्रवण, ग्रहण श्रद्धा और संयम इनकी प्राप्ति होना उत्तरोतर दुर्लभ है.
उत्तरोत्तर दुर्लभ वस्तुओंकी शक्ति होकर संयमकी भी प्रामि हो गई तो भी अल्पज्ञ आचार्यके समागम संमारमय उत्पन्न करनेवाला शास्त्रश्रयण प्राप्त नहीं होता है.
योग्य कार्यमें प्रवृत्ति करनेवाली स्मृति प्रास होनेपर भी और चिरकालतक प्राणिसंयम और इंद्रियसंयमका पालन करनेपर भी अल्पज्ञ आचार्यकै आश्रयसे मरणकालमें क्षपक संयम छोड देता है, संयमसे भ्रष्ट होता है, संयमकी आराधना नहीं करता है,