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________________ मूलाराधना आचामा ६०५ | अणालोक्य वोस मनालोनितदोष । समुज्जमाणास संगृक्तः । उन्नमाविदोषोपहतमाहारं पसति, उपकरण वा सेवते यः यति। तेन सह संघासात् संवासानुमति कुर्धेता नानुमतिस्त्यक्ता भवति इति ॥ अविचार्य तेन सहावस्थाने को दोषो नैवं यत्नः क्रियते इत्यारेकायों दोषमाच मूलारा-सोधी परिहारः । उद्भादिदोषाणां त्याग इत्यर्थः । तस्स गणिनः । अणगारं यति । समुज्जमाणस्स संगृह्णतः । उद्मादिदोषोपहतमाहार वसतिमुएकरण वा यः सेवते सेम सह संवासान् । संवासानुमतिं कुर्वता नानुमतिस्त्यक्ता गीति मन्यते । समाभ्यर्थ प्रश्रयेण गुरुमुपाश्रित्यागमनकारणं निवेदयति बिणयेणुषकमित्ता उपसंपज्जदि दिया व रादो षा॥ दीवेदि कारण पि.य विणयेण वहिप सेते ।। मूलारा-निणएण प्रपारमादिना । उयनमित्ता परगणमिवि शेषः । बसंपज्जदि उपाश्यति । निर्यापकामार्थमिति शेषः । रादो राम्रो । पीदि प्रकाशयति फारणे स्वागमनस्येति शेषः । अथमत्रार्थ:-उत्समार्थसाधनोचतः परगण गत्वा निर्यापकाचार्यमुपायति । ततश्च दिने रात्री वा अवसर प्रान्य तमुपाश्रितो बिनयेनागमकारणं जूते । एतां टीकाकारी नेच्छति अर्थ--जो मुनि दोषांकी आलोचना नहीं करता है. जो उद्गम, उत्पादना एपणा दोषोंसे युक्त आहारका, वसतिकाका, उपकरणका और संस्तरका सेवन करता है ऐसे मुनिके साथ जो आचार्य रहता है अथवा उसके साथ रहनेके लिये अन्य मुनिको अनुमति देता है. वह भी आगंतुक मुनिके समान दोषी समझना चाहिये. जो आगंतुक मुनि उद्गमादि दोषोंसे अशुद्ध हुआ है वह आलोचना भी नहीं करता है, अत एवं उसको संघसे अलग करनाही योग्य है. उसके दोषोंको विचार न कर उसके साथ रहनेसे.स्वयं भी आचार्य और संघ अशुद्ध होगा. PATATERATORS ६०५ उब्वादो त दिवसं विरसामित्ता गणिमुवष्ठादि ॥ उद्धरिदुमणोसल्लं विदिए तदिए व दिवसम्मिं ॥ ४१६ ।।
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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