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________________ मूलाराधना आश्वास अर्थ-जो सदगुणी मनुष्य अपने शुभाचरणों द्वारा अपने सदगुणोंको सद्गणी मनुष्यों में वर्णन करता है वह शोभाको पाता है. परंतु अगुण मनुष्य निर्गुणी मनुष्योंमें यदि अपने गुण वचनोंके द्वारा कहेगा तो वह शोभा नहीं पाता है. ५७० सगणे व परगणे वा परपरिपवादं च मा करेज्जाह ॥ अच्चासादणविरदा होह सदा वजभीरू य ॥ ३६९ ॥ यूयमासादनां कृथ्वं मा जातु परमेष्टिनाम् ॥ दुरंता संमृतिर्जतार्जायतं कुर्वती हि मां ।। ३७४ ।। त्यजतासंयम बेधा मुक्तिलक्ष्मी जिघृक्षवः ॥ सा दूरीक्रियते तन व्याधिनच सुखासिका ।। ३५५ ।। मा ग्रहीषुः परीवावं स्वसंघपरसंघयोः || संसारो वर्धतेऽनेन सलिलेनेय पादपः ।। ३७६ ।। विजयोदया सगणे व परगुणे वा परपरिषावं च मा करेजा । आत्मीय गणे परगणे चा परापवाद मा कृथाः। मथासावाषिरदाय होह अत्यासादनतो विरता भवत । सदा यजभीरू य पापभीरवश्च भवत ॥ प्रकारांतरेण शिक्षा प्रयच्छतिमूलारा-परपरिवाद परापवाद। अर्थ-हे मुनिगण ! आपको अपने गणमें अथवा परगणा में अन्य मुनिऑकी निंदा करना कदापि योग्य नहीं है. परकी विराधनासे आप विरक्त होकर हमेशा पापोंसे विरक्त होना चाहिये. ५७० परनिंदया दोषमाचष्टे स्पष्टार्थी गाधा--- आयासवेरभयदुक्खसोयलहुगत्तणाणि य करेइ ॥ परणिंदा वि हु पावा दोहग्गकरी सुयणवेसा ॥ ३७० ॥
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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