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मूलाराधना
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लाघवं दुष्टसंत शिष्टोऽपि ॥ किं न रस्नमयी माला स्वल्पार्था शवसंगता ॥ ३४८ ॥
विजयोदया-खुजणो वि होर लटुओ सुजनोऽपि भवति लघुः 1 दुज्जणसंमेलनाप दोसेण दुर्जनगोष्टीदोषेण । मालाब मोलगरुया मालापि सुमनसां मध्येन लध्वी होइ भवति । महनसंसिद्धा मृतकस्य संसि ॥
निंद्यगुणसंगात्तगुणपरिणति प्रणिगदति-
मुळारा स्पष्टुं ॥
रे गुण के सहवाससे मनुष्य बुरा अर्थान दष्ट होता है इसी अभिप्रायको दृष्टान्त स्पष्ट करते हैंअर्थ- दुर्जन के दोषों का संसर्ग होनेंस सज्जन भी नीच होता है. बहुत कीमनकी पुष्पमाला भी मेतक अर्थात् शव के संसर्ग कॉटीके कीमत की होती है.
अदुष्टोऽपि दुष्ट हनि शक्यते यतिः पार्श्वस्यादिगोष्ट्या हत्येतद्दृष्टान्तेनादुज्जणसंग्गीए संकिज्जदि संजदो वि दोसेण ॥
पाणागारे दुद्धं पितओ भयो चैत्र || ३४६ ॥ संयोजनैर्दुष्टो दुष्टानामिह संगतः ||
क्षीरपा ब्राह्मणः शौण्डः शौण्डानामित्र शंक्यते ॥ ३५९ ॥
विजयोदया दुज्जणसंग्गीय इति स्पष्टार्थ गाथा ||
स्थादिसंखर्गादिदुष्टोऽपि यतिर्दुष्ट इन शक्यते इत्याचऐ-
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मूलारा-पाणागारे उद्यानापानगोष्ठयां ? ( मद्यपानगोष्ठ्य इति भवेत् ) बंभो शिवभूतिनाम र यथा पार्श्वस्थ वगैरह कुमुनिओंके संसर्ग अदुष्ट भी यति लोकोंके द्वारा दुष्ट माना जाता है. इसको दृष्टान्तसे आचार्य स्पष्ट करते हैं.
अर्थ - दुजनके संसर्गसे दोपरहित भी मुनि लोकोंके द्वारा दोपयुक्त गिना जाता हैं. मदिरागृहमें जाकर कोई ब्राह्मण दूध पीवे तो भी उसने मद्य पिया है वह मद्यपी हैं ऐसा लोक मानते हैं.
भावालः
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