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________________ RSS मूलाराधना आश्वासा ५४४ स्थविरस्य प्रमाणस्य शानज्ञस्य तपस्विनः।। आर्यिकासंगतेः साधोरपवादो दुरुत्तरः॥ ३३१ ॥ विजयोदया--थेरस स्थविरस्य । तसिस्स वि अनशन.दितपस्युचतस्थापि। बहुसुदस्स वि पहुश्रुतस्यापि । प्रमाणभूदम्स प्रमाणभूतस्य । अरजाससमरिण जणजपणथं वेज दि आर्यापरिचयाज्जनापपावो भवति । मूलारा-तवस्सिस्स अनशनादितपस्युदातस्य । जर्जपणयं लोकापवादः । अर्थ-मुनि वृद्ध, तपस्वी, अर्थात् उपवास, अवमोदय, रसपरित्याग वगैरे तप करनेवाला, बहुश्रुत और जनमान्य होने पर भी यदि वह आर्यिकाका सहवास करनेवाला होगा तो बह लोगोंकी निंदाका स्थान बनेगाही. आर्थिकाके साथ परिचय होनेस उसकी निंदा होना दुर्निवार है. किं पुण तरुणो अबहुस्सुदो य अणुाकतवचरिनो वा ॥ अज्जासंसग्गीए जणजपणयं ण पावेज ॥ १२॥ न किं युमोऽल्पविकास्य मंदं विदधतस्तपः।। कुर्वाणस्यापिकासंगं जायते जनजल्पनम् ।। ३३२॥ विजयोदया--किं पुण मा पावेज जणजपणय कि पुनर्न प्राप्ग जनापवाद वा ? प्राप्नोति नियोगतः। कन ? अज्जासंसगीए आर्यायोग्या । यः ? तरणो अबहुस्सुदो अणुकिहतवचरिसो पतरुणो यतिरबहुश्रुतोऽनुकृपतपश्चारित्रश्च ॥ मुलारा—अणुकिळु अनुत्कृष्टं । अज्जासंसगीर आर्याजनगोष्टया 11 . अर्थ-जो तरुण है, वहथतता जिसमें नहीं है अर्थात जिसमें हिताहितका विचार कम है, जो उत्कृष्ट चारित्रका धारक नहीं है ऐषा यति आर्यिकाके संसर्गसे जननिदाको प्राप्त न होगा क्या? अवश्य होगा. तात्पर्य यह ई कि, जब विवकपणा, महान नपस्वी और लोकमान्यतायुक्त ऐसा मुनि भी आर्यिकाके सहवाससे अपकीर्तिका पात्र बनता है तो इतर अल्पन्न मुनिक विषयमें क्या कहना चाहिये। ५४४
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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