________________
पूलाराधना
ܐܬ݂ܳܬ݂
अर्थ- जो मुनि रास्ते के श्रम से थक गये उनकी पगचंपी करना, हस्तमर्दन, अंगमर्दन करना. जिन गुनिआ की चारसे उपद्रुब हुआ, दुष्ट पशुआंसे पीडा हुई हो, राजासे कष्ट पोहोंचा होगा, नदीके द्वारा कोई मुनि रुक गये भारी रोग से पीडित होगये तो उनका उपद्रव विद्यादिकोंसे नष्ट करना चाहिये. यदि कोई मुनि दुर्भिक्षपीडित हुए हो तो उनको सुभिक्ष देशमें लाकर उनकी पीडाका परिहार करना चाहिये. इन सब कार्योंको वैयावृत्य कहते हैं, ऐसे कार्य करने से पुनिओंका मंग्रह होता है. और आप डरो मन ऐसा बोलकर उनमें धैर्य उत्पन्न कर उनका अंगीकार करना चाहिये.
कृयाकरणं निति
अणिगृहिद बलवरिओ वेज्जावचं जिणोवदेसेण ||
जदि ण करेदि समत्यो संतो सो होदि गिद्धम्मो ॥ ३०७ ॥
समग्र वित्त यो वैयावृत्यं जिनाज्ञया ॥ तो निर्धर्मकः सकः ॥ ३०८ ॥
विजया अभिहितेत्यादिना निगूढची वैयावृत्यनिपदिक्रमेण न करोति । शक्तोऽपि सन स निर्धमभवति भवति इति मत्रार्थः ।
भैयावृत्त्या करणे दोषान्गाश्रायेनाह ...
मूल:रा स्पष्टं ।
जो मुनि वैयावृत्य करता नहीं उसकी निंदा करते हैं
अर्थ-जिसन अपना बल और वीर्य छिपाया नहीं है, और जो समर्थ है तो भी जिनेश्वरने कहे हुए क्रमसे जो वैयात्य करता नहीं है वह मुनि निर्धर्मा है अर्थात् असे भ्रष्ट हुआ है ऐसा समझना चाहिये. ऐसा इस सूत्रका अर्थ है.
अवका
१
५२.