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________________ आश्वासा HT होगा यह समझमें नहीं आता है, मृत्यु दावानलके समान है. वह इस संपूर्ण जगवरूपी वनको कय दग्ध करेगा यह मूलाराधना हम नहीं समझ सकते हैं. मत्यु आज नहीं आयेगा, अशा एकपास, अर्ममार, दो महिना मागास, एक वर्ष तक आवेगा नहीं ऐसा खात्रीसे वचन नहीं कह सकते हैं. एक क्षणमें भी मृत्युका आगमन होगा. जस्तक मृत्यु आता नहीं तबतक तपश्चर्याका उद्योग करना चाहिये. मृत्यु अमुक स्थानमें रहता है ऐसा उसका प्रदेश निश्चित नहीं है, गाडी मोटर वगैरह स्थल परही गमन करते हैं. नक्षत्रसमूह आकाशमें ही भ्रमण करते हैं. मत्स्य, मगर वगैरह जलचर प्राणी पानीमें ही फिरते हैं. परंतु अत्यंत दुःख देनेवाला यह मृत्यु स्थलमें, जलमें, आकाशमें सर्वत्र भ्रमण करता है, अग्नि, चंद्र, सूर्य, इन्द्र, ठंडा अथवा उष्ण वायु, और बर्फ समदाय इनका जहां प्रवेश नहीं है ऐसे प्रदेश बहुत है. परंतु मृत्युका सर्वत्र अप्रतिहत संचार है. वात, पित्त और कफ ये रोग उत्पन्न होनेके कारण हैं परंतु अपमृत्युक लिय मय पदार्थ कारको सकते है. वात, पित्त, कफ, शीत. उष्ण, जलवृष्टि, रंडी, व इनका प्रतिकार करनेके पदार्थ है. परन्तु इस संरमें मृत्यु का प्रतिकार करनेवाला कोई भी पदार्थ नहीं है. शीतकाल, याकाल और ग्रीष्मकाल इनका समय लोगोंको ज्ञात होता है. परन्तु मृत्युका आगमनसमय किसी को भी मालुम नहा रहता है. जप राहके मुखम चन्द्रका प्रवेश होता है तब उससे छुडाने बाला हितकर पदार्थ कोई नहीं है उसी तरह मृत्यु जब जीवको पकडता है तब उसको उससे बचानेवाला कोई नहीं है. मृत्युके बिना भी अन्य पदार्थास प्राणिऑको भय उत्पन्न होता है, जैसे दुष्ट रोग, बज्रपात वगैरहसे भय उत्पन्न होता है. अशनिपात अचानक आकाशसे होता है. तद्वत् अचानक मृत्यु प्राणिको पकडता है. आयु, बल, रूप बगैरह तबतक देहमें स्थिर रहने हैं जबतक रोगसे यह ग्रसित नहीं होता. जबतक वायुका आगमन नहीं तबतक फल श्रुतमें स्थिर रह सकता है वह गिरता नहीं है, जब रोगसे शरीर पीडित होता है तब मुखमे आत्महित करना नहीं होता है. जैसे अग्नीसे घर चारों तरफसे जब घिर जाता है तब उपाय करना नितरां अशक्य है. शरीर में रोग नहीं हो तो भी जब मित्रके समान दखिनेवाला रागशत्रु इस मनुष्य के चिनको पीडित करता है तब यह मनुष्य समता धारण करने में असमर्थ होता है. वैद्यके अच्छे प्रयोगोंसे प्राणीका पित्तप्रकोप शांत होगा परंतु प्राणीका अहित करनेवाला रागभाव शांत होना पड़ा ही कठिन है. पित्त शांत होनेपर जैसा प्राणी स्वकार्यमें चित्त लगाता है, तथा पूर्वकर्म शांत होनेपर रागमाय शांत होकर आत्मकल्याण करनेमें मनुष्य समर्थ होता है. इस प्रकार इस जगतमें मृत्यु, राग
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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