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________________ मुलाराधना आश्वासा रखनेवाले, उत्तमक्षमादिक दश प्रकारके धर्ममें स्वयं प्रवृत्त होकर गणको प्रवृत्त करनेवाल एसे अपने पूर्वाचायको मन बचन कायसे क्षमा मांगते है. शमणा प्रकरण समाप्त हुआ. अनुशासननिरूपणार्थ उत्तरप्रबंधः संवेगजिणियहासो सुत्तत्थविसारदा सुदरहस्सो ॥ आदहतियो वि हु चिंतेदि गणं जिणाणाए ॥ २७१ ।। स सुत्रार्थरहस्यज्ञः स्वार्थनिष्टोअप यत्नतः ॥ संविग्नश्चितयत्येवं गणं धीरो जिनाज्ञया ।। २७०॥ विजयोदश-संगजिगिदवासी संसारभीकतया करणभूतथा उत्पादितहाग्नः। परिग्रह स्मिस्त्यने अभ्यंतराश्च रागात्रयः निमित्तापायादपयांति । तदपगमात्तन्मूलस्थितीनि यमाणि प्रलयमुपयति । तेषु नाप्येष चतुर्गतिभ्रमण नयति इति विजितहषः सुतस्थविसाग्दो मुत्र जिनपणीत तदर्थ च विसारको निपुणः । सुदरहस्सो श्रुतप्रायश्चितग्रंथः। आरचितओ विए आन्मनयोजनाचतापरोऽपि । चितेदि गण जिप्पाणाप, जिनानामाझया गणचितां करोति। अब परगणं प्रस्थातुमुनातेन गुरुणा गणस्य संपाचमनुशासनं गायानामेकोतरशतेन निरूपयति तत्र तायदुपक्रममाह गलारा-वेगजाणिददासो संसारभीरुतया करणभूतयोपाहितो हासो हो येन । अस्मिन्बाहापरिपहे त्यक्ते नितिनापायावतरंगा रागादयो उपान्ति, तदप गमात्तन्मूलस्थितीनि कर्माणि नश्यन्ति, तेषु च नष्टेष्वेव चतुर्गतिभ्रमण यिनीति संजालप्रमोद इत्यर्थः सुदरासो अतप्रायश्चित्तग्रन्थः । चित्तेदि इति वारीच्यतानिरूपगेन अनुगृह्णाति ।। उपदेशका निरूपण करने के लिये उत्तरप्रबंध - अर्थ संसारसे भयमुक्त होकर परिग्रहविषयक हर्षका जिन्होनें त्याग किया है. जिनेश्वग्न कहे हुये सूत्रोंमें अर्थात आगममें और जीवादिक पदार्थों में जिन्होनें निपुणता प्राप्त कर ली है अर्थात् जिनागम और जीवादिकपदार्थोका जो ज्ञाता है, प्रायश्चित्त ग्रंथका जिन्होंने श्रवण किया है. ऐसे आचार्य आत्महितकी चिनामें तत्पर होते हुये भी जिनाज्ञाकी अनुमार चतुर्विध संघकी चिन्ता करते हैं. ये आचार्य संसारसे भययुक्त होकर परिग्रहोंक NAT.ANTHARATARinatanSmartAstotaMPEDA प m ARAKAMAKATRESHETAmAttact
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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