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मूलाराधना
आवास:
मूलारा---ममकार ममेमे इति दुद्धिः । णेहरागेण स्नेहन प्रणयेन, रागोपायनिवारणामिलापः कल्याणप्रापणमनोरधन तेन । भाणा भाषिता यूर्य ! तं भो सब्वे तत्कटुकपरुषभाषणं युष्मान्सर्वान्क्षमयामि तज्जनितकालुष्यरहिता| करोमीत्यर्थः।
अर्थ- मुनिगण! तुम्हारे साथ मेरा दीर्घ कालनक सहवास हुआ है इसलिय मैंने ममत्वसे, स्नेहसे, द्वेषसे आपको कटु और कठोर वाक्य कहें होंगे इसलिये आप सर्व मेरे ऊपर क्षमा करेंगे ऐसी आशा है. मेरे कटु कठोर भाषणसे आपके मनमें कलुषभाव उत्पन्न हुआ होगा तो उसको त्याग कर मेरे अपराध की आप क्षमा करो.
गणेन संपाद्यक्रममाचष्टे
वैदिय णिसुडिय पडिदो तादारं सब्बबच्छलं तादि । धम्मायरियं णिययं खामेदि गणो वि तिविहेण ॥ २७८ ।। प्रणम्य पतितः संघखातारं वत्सलं यतिम् ॥ धर्माचार्य निजं सर्व सम्यक् क्षमयति त्रिधा ॥२७८ ॥
इति क्षमणासूत्रम् । विजयोदया- वेदिय णिसुस्यि पडिदो अमिबंध संकुचितपतितः । तादारं संसारवुःखात्रातारं । सव्ववडलं सर्वेषां वत्सल । तादि यति । घम्मायरिये दशविधे उत्तमक्षमादिके धर्मे स्वयं प्रवृत्तं बन्ये प्रवर्तक । णिययं आत्मीयं । आत्भीयं । वामेदि गणो वि तिविहेण शमां प्रायति गणनिषिधेन । नमावणा समत्ता ।
गणेन कार्यमाणस्य क्रममाछ--
मूलारा-बंदिय णिमुडिय पडिदो बंदित्या संकुचितपनितः प्रणम्य भूतलन्यरतपंचांगोभृत इत्यर्थः । तादार गंसारवादक्षकं । तादि यति । णिययं निज ।। क्षमणा सूत्रतः ।। १३ ।। अंकत: ३ ॥
मणने भी आचार्य क्षमाके अनंतर कोनसा विधि करना चाहिये उसका वर्णन-- ___अर्थ-वंदना करके भूतलपर पंचागोंका जिन्होने स्थापन किया है अर्थात् प्रथम बंदना करके अनंतर पंचांग नमस्कार जिन्होंने किया है ऐसे वे गणके सर्व मुनिजन संसारदुःखसे रक्षण करनेवाले, सर्वके ऊपर प्रेम