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________________ मूलाराधना आश्वास ४६८ Mentation पिजयोदया-उल्लीणोलीणेहि य प्रबर्द्धमानेन हीयमानेन च तपसा चतुर्थपष्ठाईफमेणानशनतपोवृद्धिः । एकद्धि कालादिन्यूनतया अवमोदर्यवृद्धिः । एकस्य रखस्य वयोरयाणामित्यादिना क्रमेण रसपरित्यागवृधिः । पकपाटकं, गृहसप्तकं, गृहत्रयं या प्रविशामीति. भिक्षापासपरिमाणन्यूनताकरणेन वा वृत्तिपरिसंख्यानवृद्धिः 1 विषसे आतपनं हत्या रात्रौ प्रतिमावग्रहकरणमित्यादिना कायक्लेशवृद्धिः । एवं श्रमे महति संजाते क्रमेण अनशनादीनां न्यूनताकरणं । अहवा अथपा एयंतयङमाणेहि एकावेन वर्धमानः तपोभिः । सलिहद संलिखति । मुणी मुनिः । देहं । आहारविधि अशनादिविधि । पयर्गितो । अस्पीकुर्षम् ॥ प्रकारांतरेण सल्लेखनोपायमाह--- मूलारा- उल्लीणोड़ीणेहिं बर्द्धमानीयमाभरनशनादितपोभिरिति शेषः । नथाहि -चतुर्थपटाविक्रमेणानमानस्य दिः । ककवलादिन्यूनतवावभारत | एकश्चादिरसत्यागकनेग रसपरित्यागस्य । एफवाटक सप्त पंच त्रीणिवा गृहाणि प्रविश्य भिक्षां गृहामि । प्रासं चैकशिदित्यादिहानिक्रमेण गृहामि इन्यादिक्रमेण वृत्तिपरिसंख्यानस्य । दिवानापने कृत्या रात्रौ प्रतिगायोगावग्रहकरणमित्यादिविधिना कायक्लेशम्य । शून्य गृहमायसमीपगिरिगुहारण्यादिबसत्याप्रमाणन विविक्तशय्यासनस्य च बोद्धव्या । एवं ग महानि श्रमे जाने मनि अनननादीनां क्रमेण न्यूनीकरण हानिः । अहवा अथवा । गंतवहिडाव मानेरेव नदीवमानैः । आहारविधि विदिनययाहा। पदांगतो प्रत. नुकयन अल्पीकुर्वमित्यर्थः। अर्थ-क्रमसे अनशनादि तपको बढाते हुये यतिराज अपने देहको कृश कर शरीरसल्लखना करते हैं. उसका विवेचनक्रम इस प्रकार समझना चाहिये-एक उपवास, दो उपवास तीन उपवास इस प्रकारसे ये अनशन तप बढाते हैं, मुनिक आहारका प्रमाण बत्तीस ग्रासोका कहा है. उनमे एक ग्रास, दोन ग्रास, तीन ग्रास कमी कमी करके अनमोदय तपकी वृद्धि करते हैं. एकरसका त्याग, दो रसोंका, तीन रसोंका इत्यादि क्रमसे रसत्याग करते जाना यह रसपरित्याग तपकी वृद्धि है. एक गल्लीमें ही आज आहार ग्रहण करूंगा, सातघर, तीनघरमेंही प्रवेश कर आहार करूंगा, अथवा आहारके ग्रासोंका परिमाषण कर आहार ग्रहण करूंगा इत्यादि रूपसे वृत्तिपरिसंख्यान तपमें वृद्धि समझना. दिनमें आतापन योग कर रानी प्रतिमायोग धारण करनेका नियम करना. इत्यादि प्रकारसे कायक्लेश तपमें वृद्धि करना. इन तपोंकी बुद्ध करनेसे जब महान् श्रम होता है तब वे अनशनादि तपका प्रमाण ANTANMAmer.. KATONESTRTHISEDIA
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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