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________________ बलारापना आश्वासः ५५८ विजयोदया-दंताणि दांतानि इंद्रियाणि च । होति भवन्ति । अनशनाघमोदर्यवृत्तिपरिसंख्यानेन जिला दांता मयति इति । विविक्तशय्यासनेन इतराणि द्विपाण दांतानि भवति । मनोद्रियविषयरहितायां वसतावस्थानात्तानि निगृहीतानि भवन्ति । समाथिजोगा य फासिदा हॉति । रत्नत्रयसमाधानसंबंधाः स्पृश भवन्ति । भशनादिकं स्यजता विषयरागो निरस्तो भवति । विषयरागध्याकुलो हि रत्नत्रये न घटते। असति तस्मिन्व्याकुलोऽशुभपरिणामैकमुखोभवति इति मन्यते । अणिमूहिदधीरियदा भनिगूढवीर्यता च भवति । वीर्याचारे प्रवृत्तश्च भवति । जीविदतण्डा य या जीविते तृष्णा च म्युरिछातिं गता। न बिजीचिताशावान् यशनादिकं त्वषतुमीदते। जीविते सृष्णावान्यत्किचिस्कृत्वा असंयमादिकं प्राणानेव धारयितुमुचतो भवति न रखत्रये। मूलारा-वंताणि अनशनादिचतुष्टयेन हि प्राधान्येन जिला दांता भवति । विविक्तशय्यासमेन चेतराणि इंद्रियाणि याम्यति । मनोझेंद्रियविषयाणां तद्रागकोपिनां विविधवसतो असंभवात् । समाधिजोगा रलत्रयकामतासंबंधाः । फासिदा अनुष्ठिताः । अशनादित्यजनाद्विपयरागनिरोधेन भरिणामैकमुखलोपण्ने ! अणिगहिदवीडियदा । अनिगूहितवीर्यता वीर्याचारप्रवृत्तिश्च स्यादित्यर्थः । बोरिडाणा निरस्ता लक्ष्यते । न हि जीविताशावानशनादिकं त्यक्तुमीहते, किं तहि यत्किचित्कृत्वा प्राणानेव धतुं उत्सहते न रत्नत्रयम् । अर्थ-अनशन, अवमोदर्य और वृचिपरिसंख्या इन तीन तपोंके द्वारा जिव्हाका दमन होता है. विवि तशय्यासन तपके द्वारा पर्शनादि इंद्रियोंका दमन होता हैं. इंद्रियोंको प्रिय ऐसे विषयोंका अभाव जिसमें है ऐसी बसतिकामें निवास करनेसे स्पर्शनादिक इंद्रियो वश होती है. इन बाम तपश्चरणोंसे रत्नत्रयमें एकाग्रता प्राप्त होती है, आहारादिकका त्याग होनेसे विषयमेम नष्ट होता है, विषयों के प्रेमसे व्याकुल हुआ मनुष्य रत्नत्रयमें स्थिर होता नहीं है. रत्नत्रयका अभाव होनेपर बह व्याकुल पुरुष अशुभ परिणामाम ही लीन होता है. ऐसा समझना चाहिये. बाह्यतपसे मुनिराजको अपनी आरिमक शक्ति प्राप्ति होती है. अर्थात् चाश तप कर मुनिराज धीर्याचारमें प्रवृत्त होते हैं. बाह्यतपके प्रभावसे मुनिराजकी जीवितकी आशा नष्ट होती है. जिसका जीवितके ऊपर स्नेह है यह आहारादिकोंका त्याग करना पसद नहीं करता है. जीवितार्थी मनुष्य चाहे जो असंयमादिक करके प्राण धारण करनेके लिये उद्युक्त होता है, परंतु रत्नत्रयमें प्रवृत्त नहीं होता है, ४५८
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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