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________________ मूलाराधना माश्वास: अयोग्यजनसंसर्गराटोकलकलादयः॥ आविविक्तास्थितेः संति समाधानानादेनः ।। २३२॥ प्रारभाराकृत्रिमारामदेवतादिगृहादिषु॥ जायते वसतः साधोः समाधानमखंडितम् ॥ २३३ ।। विजयोदया-फलहो बोलो ममेये वसतिस्तवेयं बलतिरिति कलहो न केनवित् अन्यजनरहितत्वात् । वोलो शब्दबहुलता । झंझा संक्लेशो। वामोहो बैंचियं । संकरो अयोग्यरसंयतः सह मिश्रणे । ममत्यं च ममेदभावश्च । स्थि नास्ति । जाणज्नयषिधादो ध्यानस्याध्ययनम्य च व्याघातः । उक्तः फलहादिन विद्यते ।क? विविज्ञाप वसधीए चिवि. तायां बसती । एकस्मिन्प्रमेये निरुद्धमानसंततिर्यानं । अनेकप्रमेयसंचारी स्वाध्यायः। विविक्तबसनौ बसतां दोपाभावमाह मूलारा--कलहो ममेयं वसतिसषेयमिति कलिः । रोला रोल: शब्दबटुलतेत्यर्थः । संसा संकेश झकटक इत्येके । वामोहो चित्त्यं । संकरो असंयतैः सह मिश्रण । अर्थ यह मेरी बसतिका है, यह तेरी वसतिका है एमा कलह करने का प्रसंग विविक्त वमतिकामें रहने चाले मुनि के उपर आता नहीं है. एकांत वसतिका मनको व्यग्र करनेवाले शब्द गुजनमें आते नहीं हैं, मंग परिणाम आर मनकी व्यग्रताभी वहां होती नही है. अयोग्य असंयत पुरुपाक साथ संबंध नहीं रहता है. विविक्त वसतिकाकं ऊपर ममत्व रहता नहीं है. ध्यान और अध्ययन में व्यत्यय आता नहीं. ध्यान और अध्ययन में यह फरक है.- एकही विषयमें ज्ञानकी परंपरा स्थिर होना वह ध्यान है और अनेक विषयों में संचार करनेवाली ज्ञानपरंपराको स्वाध्याय कहते हैं, ४५३ इय सल्लीणमुत्रगदो सुहप्पवत्तेहिं तित्थजोएहि ॥ पंचसमिदो तिगुत्तो आदछपरायणो होदि ।। २३३ ॥ एवमैकाग्यमापन्नो ध्यानः शुद्धप्रवृत्तिभिः ।। समितः पंचभिर्गतस्त्रिभिरस्ति हितोद्यतः॥ २३४ ॥
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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