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लाराधना
भावासः
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कर्मका क्षयोपशम पाकर जो शान उत्पन्न होता है उसमें भी यहां श्रुत शब्द समझना चाहिये. इस श्रुतज्ञानकी भा- वनासे सम्यग्ज्ञान, दर्शन, तप, संयम इन गुणोंकी प्राप्ति होती है.
शंका-जो मनुष्य ज्ञानभाषनामें तत्पर है वह ज्ञानमें परिणत होगा यह दर्शनादि परिणामोंमें कैसा परिणत होगा. क्रोधकषायसे परिणत हुआ अदमी भाया परिणत नहीं होता है. उत्तर-आपका यह कहना योग्य नहीं है. जो जिसके साथ अविनाभावी रहता है वह उसके सद्भावमें उसके आधारमें रहेगा ही. यथा जहां जहां कृत कत्व रहता है वहां वहां अनित्यत्व रहेगा ही. ज्ञानके विना सम्यग्दर्शनादिक होते नहीं है.
शंका-असंयत सम्यग्दष्टी में जान है परंतु उसमें तप और संयम भी है क्या? यदि होंगे तो उसको असंयमी क हते हैं. अगशद समग और संचम सी रहते हैं. अर्थात् वानके साथ उनका संबंध नहीं है.
उत्तर-ज्ञानभावना होनेपर तए संयमादिक होते ही है ऐसा इस सूत्रका अभिप्राय नहीं है. परंतु तपः संयमादिक यदि उत्पन्न होंगे तो बानभावना के रहते ही उत्पन्न होगें. अन्यथा नहीं. तप और संयम ये कार्यरूप हैं और वे चारित्र मोहनीय कर्मक क्षयोपशमकी अपेक्षा रखनेवाले जानके द्वारा प्रवृत्त किये जाते हैं.
कारण अवश्य कार्यवान होते ही है ऐसा नियम नहीं है. काष्ठादिकी अपेक्षा रखनेवाला अग्नि धूमको उत्पन्न करेगाही ऐसा नियम नहीं है. इसलिये ज्ञानभावनासे में ज्ञान, दर्शन, तप संयम परिणामों में आत्माको प्रवृत्त करूंगा एसी जो उपयोग प्रतिज्ञा उमको वह मुनि एकाग्र होकर अचलित होकर अनायाससे संपूर्ण करता है.
जदणाए जोग्गपरिभाविदरस जिणवयणमणुगदमणस्स ॥ सदिलो काढुंजे ण चयति परीसहा ताहे ।। १९५ ॥ स्वन्यस्तजिनवाक्यस्य रचितोचितकर्मणः॥ परीषहापदः शक्का न कर्तुं स्मृप्तिलोपनम् ॥१९७५
इति श्रुतम् ।। चिजयोदया--जदणाए यत्नेन । जोग्यपरिभाविधस्स युज्यते अनेन अनशनादिना निर्जराथै यतिरिति या सपः योगशचनात्रोच्यते । तेनायमर्थः । तपसा भाषितस्येति । जिणवयणमगधमणस्स जिनवचनानुगतचेतसः ।