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________________ लारामना आश्वासः || जब उसको मालुम पड़ता है तो यह आहारका त्याग करने मतिको उक्त करता है. उस समय आहार और व्यायामसे प्राप्त किया हुआ बल वह छिपाता नहीं है. धर्म साधनको सहायता प्रदान करनेवाले आहारसे मैंने शरीर धारण कर चिरकाल तक स्वपरोपकार किया है. परंतु जर आयुप्य थोडा रहता है तब शरीर, आहार ग्रहण करनेपर भी टिक नहीं सकता है. इस लिये मेरेको अब आहारका त्याग करनाही योग्य है. ऐसा वह मुनि विचार करता है. दीर्घकालतक मैन यह मुनिपर्याय धारणा किया है अन आणज्य बना रहा है. गइ पाहाद मागका कारण पुव्युत्ताणण्णदरे सल्लेहणकारणे समुप्पण्णे ॥ तह चेव करिव मदि भत्तपइण्णाए णिस्छयदो ॥ १५७ ॥ संन्यासकारणे जाते पूर्वोक्तान्यतमे सति ॥ करोति निश्चितं वृद्धि भक्तस्यागे तथैव सः ॥ १५९॥ विजयोत्या-पुखुत्ताणपणदरे पूर्वमुक्तानां 'बाहीच दुप्पसज्झा ' इत्यादीनां मध्ये अन्यतरस्मिन् । सल्लहणकारणे सम्यक् कायकषायतनूकरणे सल्लेखना तस्याः कारणे था | समुप्पयो समुपस्थिते । तह चेव तथैव च । यधाप आयुषि करोति भक्तत्यागे मति । तथैव णिच्छयदो भत्तपहष्णाय मदि करे का । निश्चयतो भक्तप्रत्याख्याने मतिं कुर्यात् । एतगाथाद्वयं सूत्रकारवचनम् । न केवलमायुपोऽल्पनैव भक्तल्यागमतेः कारणमपि तु ननम्य पपि इति दी यमाह.. मूलारा---यथा आयुष्यरूपे नथैवात्राचीन्यर्थः ।। आयुष्यकी अत्यल्पता ही आहार त्यागके प्रति का है एमा नहीं है किंत और भी कारण है अर्थ- इसी ग्रंथ आहारत्यागके दुसरे भी कारण पूर्वमें बताय है 'वाही व दप्पसज्झा' इत्यादि गाथामें कारणोंका उल्लेख किया है, जैसे असाध्य व्याधि होनेपर आहारका स्याग करना चाहिये बगैरह इन कारगोमेंसे कोई कारण उपस्थित होनेपर सल्लेखना करनी चाहिये. शास्त्रोक्त विधि की अनुसार शरीर और कपायोंको कश करना सल्लेखना है. जैसे अल्पायुष्य रहनेपर आहार त्याग करने में अपनी बुद्धि लगानी चाहिये उसी तरह ३६९ Sorter
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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