________________
मूलाराधना
आश्वासा
३४३
अमियतविहारिणोऽतिशयार्थकुशलत्वगुणलब्धिमाह--
गूलारा-सुत्तत्वगिरीमा अस्सीहापानि जारीटोलात्तिकं प्रमाणान्तरदर्शितबस्तुतदुपविरुद्धानुपदेशनेन निर्दोपमित्येतद्गुणसहित सूत्रं, तस्थार्थो बायोऽन्सरो वा तयोः स्थिरीकरणमित्यमेवेदं सूत्र शब्दतोड़भिधेयं पास्येदमेयेति । अदिसयिदत्याण विशिष्टार्थानां प्रमाणनवनिक्षेपेनिरुक्त्यनियोगद्वारेण च निरूप्यमाणः सूत्रार्थो ह्यतिशयितः स्यात् । अदिसयसच्छायेत्यपरे पठन्ति, तत्रायमर्थोऽतिशयभूतानां शास्त्राणां प्रत्यप्राणामरातीयसरिफतानां चिरंतनानामेव वा प्रचरदुपाणां | जबलद्धी इतिः प्राप्तिर्वा । आचरियदसणेण व्याख्यातमतभेदेन । फेचिद्धि निक्षेपमुखेनैप सूत्रार्थमुपपादयन्त्यपरे नयानुसारेणान्ये सदाद्यनुयोगोपन्यासेन च । अत्र -
अतिशयार्थ कुशलता नामक गुणका वर्णन--
अर्थ -जिसमें अल्पवाकी रचना है, प्रतिपाद्य विपयमें संशय उत्पन्न न हो इस रीतीसे सारयुक्त अर्थका जो निरूपण करता है, जिसमें प्रत्येक पद साथ ही है, निरर्थक एक भी पद जिसमें नहीं है, प्रमाणांतरसे जो वस्तुका स्वरूप दिखाया होगा उससे विरुद्धस्वरूपका प्रतिपादन जिसमें नहीं है. अर्थात पूर्वापरासंबद्धतादि दोपोंसे जो दर है उसको सूत्र कहते हैं. अर्थात् सूत्रमें उपयुक्त गुण हो तो वह सूत्र निर्दोष समझना चाहिये. इस सूत्रस्थ शब्दरचनास जो । अर्थ निकलता है वह बाह्यार्थ है. और प्रत्येक शब्दकी उपयुक्तता ध्यान में आनेपर जो विशेष अर्थ तथा सुसंबद्धता अनुभवमें आती है उसको अध्यंतरार्थ कहना चाहिये. इस सूत्रमें जो शब्द हैं ये बिलकुल ठीक हैं और इसका वाच्यार्थ यही है ऐसा जो प्रतिपादन करना उसको सूत्रार्थस्थिरीकरण कहते हैं, देशांतरमें विहार करनेस मुनिको यह गुण प्राप्त होता है. अनियन विहार करनेसे प्रमाण, नय, निक्षप, अनुयोग इन उपायोंके द्वारा मूत्रार्थका निरूपण करनकी पति भी मालुम होती है. व्याख्यान करनेवाले आचार्योंका मतभेद अनुभवमें आता है. कितनक आचार्य निक्षपका आथय लेकर मूत्रार्थका विवेचन करते हैं. कोई नैगमादि नयाकी नानाविधता ध्यान में रखकर उनके आश्रयसे सूत्रार्थविवेचन करते हैं. अन्य आचार्य सत, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन इत्यादि अनुयोगोंके द्वारा मूत्रार्थ कहते हैं. ऐसी नानापद्धतिओंका परिज्ञान देश बिहारसे होता है, 'अदिसयसत्थाण होइ उबलद्दी' ऐसा भी पाठ है. इसका अथें इस प्रकार है