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________________ आश्वासः मूलाराधना || है, चर्मके टुकडोंसे वेष्टित भट्टीके डेलेके समान नेत्र अंदर तो निःमार और ऊपरसे मनोहर दीखते हैं, ऐसे शरीरमें एक ही गुण है. वह यह है कि, यह धर्मसाधनकेलिए सहाय करता है. पर्वतपरसे बहनेवाली नदीके प्रवाहके तुल्य यौवन अस्थिर है. तिनकेकी आंग्रेज्याला उत्पन्न होकर जल्दी नष्ट होती है वैसे संपत्ती भी प्राप्त होकर शीघ्र नष्ट होती है, शरीर संपदा और तारुण्यका स्वरूप जानकर हे जनहीं आप प्रमादको छोड़ दो. जन्मसमुद्रके दुसरे किनारे की माप्ति करने के लिए उद्योग करो, प्रमादस हमसे जो अपराध हुये होंगे उनकी आप क्षमा करो. ऐसा नीर्थकर का भाषण होनेके अनंतर सुरकुमारों द्वारा देव इंदभि शब्द करने लगते हैं. इंद्रप्रमुख सकल जगत उससमय जय जय कार करता है. चारों तरफ देवांगनायें सुंदर नृत्य करनी है. उमसमय त्रैलोक्य को अलंकार सदश प्रभु शुक्ललेश्याके समान श्वेतवस्त्र पहेनते हैं. मानो मुक्तिकी दूतीही है एसी रत्नमालाको धारण कर व अपना गला स्मोमिन करते हैं, विरक्त पुरुपाके भी मुखपर हम रागभाव उत्पन्न करने में हम चतुर हैं. हमारा चतुरपना देखो एसा कहकर अपनी मानो चतुरता दिखानवाल ऐसे कुंडलोंके द्वारा प्रभूके दो खिग्ध और सुंदर कपोल अपूर्व शोभाको धारण करने लगे. यदि प्रभूको वृत्त चारित्र प्रिय है तो इस समय प्रभूको हमसे प्रयोजन है क्यों कि हम भी वृत्त है अर्थात् वृत्त-गाल हैं ऐसा अभिप्राय मानो धारण कर प्राप्त हुए कटकासे-कर कंकणोंसे प्रभूके हाथ आश्लिष्ट होगये. जिनमें प्रभूकी महारत्रकी कल्पना है वे कितने सुंदर है हम भी उच्च स्थानमें रहकर देखेंगे मानो ऐसे अभिप्रायसे ही मस्तकपरके मुकुटके रत्नसमुदायसे प्रभु शोभने लंग. इस तरह भूपणालंकृत होकर भगवानने निर्वाणपत्तनका मानो गोपुर ही है ऐसे विमान में प्रवेश किया. तदनंतर इंद्रोंने यह विमान अपने कंधोंपर धारण किया. देवांगना, चतुर्णिकायके देव और सातपकार का देवसैन्य इनसे वेष्टित होकर प्रभू रम्यतम देशमें जाकर विमानसे उतरे, उत्तर दिशाको मुखकर सिद्धको नमस्कार कर मुकुटादिक अलंकार क्रमस अंगपग्स उतरते हैं. बाह्याभ्यंतर परिग्रहोंका त्याग कर मनवचन कायसे रत्नत्रयका स्वीकार करते हैं. इस तरहका दीक्षा II कल्याणिक देखनसे मुनिओंका सम्यग्दर्शन निर्मल होता है. संपूर्ण पदार्थोंका स्वरूप जिससे जाना जाता है उसको ज्ञान कहत है, यहां केवल ज्ञानको ज्ञान कहते ३३६ ManojASSASSESED
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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