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________________ मूलारापना मूलारा-पीचं लागं नीचैः स्थान गुर्वादों माम्यस्थाने उद्रीभूते निविष्टे या ततोऽन्यत्र तस्य वामपा पृष्ठदेशे वा शिष्यगणावधानं कर्तव्यमित्यर्थः । पीपं गमणं आसीन स्थित वा गुरौ स्वयं गच्छतः शिष्यस्य तं दुरारपरिहत्य ftमृतकरचरणस्य अवनतगात्रस्य गमनं । सहगमने वा पृष्ठतः स्वशरीरमावभूभागेन तं परिहत्य गमनं । णीचं च आसणं चशब्दोऽयमुत्तरत्र योध्यः। नीचैम्पयेशनं, पृष्ठतः स्वहस्तपादश्वासापद्ववर्जनमपवेशनम् । अग्रतोऽभिमुखं मनागपसस्य वामपा अनुद्धतम्य मनागवनतोत्तमांगस्य चोपवेशनम् । आसन गुरायनविष्ट स्वयं भूगायासन या । अयनं च नीचमिनि पदघटना । अनुन्नने देश शयन गुमनामात्रामा भूभाग वा स्वशिरो यथा भवति तथा शयां वा हस्तपादादि चट्टणवर्ज । आगणदाणं आसितुभिर छन्तं गुर्वादियः ज्ञात्वा भूभाग पीठादिक च प्रमार्जनयोग्यं न चेति चक्षुषा निरूप्य प्रतिलेखनेन च विः शनैः प्रमृज्य नत्र भूभागे प्रमाणपीठादेः स्थान! उत्सला गया मजवाडेगुर्वादिना जिक्षितस्य स्वयं वा संपादनं । ओगासदाण अवकाशनं शीनातस्य स्वाधिष्ठितनिवातस्थानदान, उगाचस्य स्वशीनलस्थानं, ग्रामनगरादौ स्वनिवासस्थानदानं बा । अर्थ- अपने हाथ, पांव, श्वासोच्छ्वासादिकोंसे गुरु आदि मुनिजनोंको उपद्रव न होगा इस पद्धतीसे उनके पीछे बैठना चाहिये. गुरुजनोंके सम्मुख बैठना हो तो उनके वामपार्श्व बैठना चाहिये. उद्भूततारहित, अपना मस्तक किंचित नम्र कर बैठना चाहिये, गुरु आसनपर विराजमान होनेके अनंतर स्वयं जमीनपर बैठना चाहिये, गुरु जहां सोये हैं उसके ऊपरकी जमीनपर शिष्यका शयन करना अनुचित है, गुरुके नाभितक जो जमीनका परिमाण होगा उतनी जमीन छोडकर नीचे सोना चाहिये अर्थात दीड, पान दो हाथका अंतर छोडकर नीचले भूमीपर उनके चरण तरफ अपना मस्तक करके शिष्य शयन करे, अथवा अपने हाथ, पांव इत्यादिकोंसे गुरुको धक्का न लगेगा इस रीतीसे शयन करना योग्य है. जब गुरुकी बैठनकी इच्छा दीखेगी तब जमीन और आसन वगैरह प्रमार्जन करने के योग्य है या नहीं यह आखोंसे देखकर नंतर हलकी और कोमल पीडीके द्वारा जमीन अथवा चटाई वगैरह स्वच्छ करके गुरुको देना चाहिये. ज्ञान और संयमका जिससे उपकार-वृद्धि होगी एसे शास्त्र, पीछी वगैरह इनको उपकरण कहते है. शास्त्र में जो उपकरण मुनिओंको ग्रहण करनेमें दोष नहीं है वह गुरुओंको यदि उनकी इच्छा हो तो प्रदान करना चाहिये. उद्गम उत्पादनादिदोपोंसे रहित जो अच्छी तरह प्रमार्जित हो सकते हैं ऐसे नाहिये. यदि गुरु शीतसे पीडित हुए हो तो अपना निर्वात स्थान उनको देवें, यदि गुरुको उष्णतास
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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