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मावासा
मूलाराधना
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होता है. इसलिये बह वायोपत्रमिक भाव है. ऐसे योगसे निवृत्त होना यह सामायिक है अर्थात् अशुभकर्मका ग्रहण करनेवाले योगरूप आल्मा की परिणति न होना यह सामायिक शब्दका अर्थ है.
मिथ्यात्व, असंयम और कपाय ये दर्शनमोहनीय कमके उदयसे आत्मामें उत्पन्न होते हैं. अतः ये भाव औदमिक हैं. मिथ्यात्व-तत्वोंमें श्रद्धान न करना, असंयम-हिंसादि पंच पापोंको असंयम कहते हैं. क्रोध, मान, माया, लोभ ये परिणाम परस्परसे और मिथ्यात्व असंयमसे बिलकुल भिन्नस्वरूप है ऐसा अनुभव में आता है. जिसके कारण भिन्न रहते हैं वे पदार्थ एकस्वरूपके नहीं होते हैं. जैसे शाली और गेदुओंके कारण भिन्न होनेसे वे एक नहीं है. वैसे ही मिथ्यात्व, असंयम और कपाय इनके हेतुओंमें और स्वरूपमें भी भिन्नता होनेसे ये परस्पर तो भिन्न है. ऐसे परिणामांस. विरक्ति, होना यह प्रतिक्रमण कहा गया है. सावद्ययोगमात्रसे निवृत्त होना सामायिक है. ऐसा दोनों में बडा भेद-विशेष है.
इन परिणामोंके भेदोंका आश्रय कर 'चुपच्चयाण पंधो' यह सत्र भवस हुआ है. यदि योगके ही चार भेद माने जाते तो योगके साथ मिथ्यात्वादिकांको चार संख्या मानना न्याय नहीं होता.
प्रत्याख्यान आवश्यक-भविष्यकालीन क्रिया में नहीं करूंगा ऐसा गंकल्प करना यह प्रत्याख्यान आवश्यक है. यह नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव से विकल्पसे छह प्रकारका है. अयोग्य नामका में उच्चार नहीं करूंगा ऐसे संकल्पको नामप्रत्याख्यान कहते हैं, आप्ताभासके हरिहरादिकांकी प्रतिमाओंकी में पूजा नहीं करूंगा, मनसे, बचनसे और कायसे त्रम और स्थावर जीवोंकी स्थापना में पीडित नहीं करूंगा ऐसा जो मानसिक एकाग्र रूप संकल्प वह स्थापना प्रत्याख्यान है. अथवा अहंदादि परमेटिओंकी स्थापनाका-उनकी प्रतिमाओंका में नाशन करूंगा, अनादर नहीं करूंगा. यह भी स्थापना प्रत्याख्यान है.
द्रव्यप्रन्याख्यान-अयोग्य आहार, उपकरण वगैरह पदार्थोंको में ग्रहण न करूंगा एसा संकल्प करना.
शत्रप्रत्याख्यान-अयोग्य व जिनमे अनिष्ट प्रयोजनकी उत्पनि होगी, जो संयमकी हानि करेंगे अथवा 10 संकुशपरिगामीको उत्पा करेंगे ऐगे श्रेत्रोंको में त्यागूगा ऐसा संकल्प करना यह क्षत्रमत्याम्यान है
कालप्रत्याख्यान-कालका त्याग करना शक्य ही नहीं है. इसशिये उम कालमें होनेवाली क्रियात्राको त्यागने कालका ही त्याग होता है ऐमा यहां समझना चाहिये. अर्थात् मध्याकाल, रात्रिकाल वगैरह समयमें