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________________ मलाराधना २८३ वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग ये छह आवश्यक क्रिया है- उसमेंसे सामायिक क्रियाका वर्णन आचार्य कहते हैं. सामायिक के चार भेद हैं-नामसामायिक, स्थापना सामायिक, द्रव्यसामायिक और भावसामायिक. नामसामायिक – जाति, गुण, क्रिया वगैरह निमित्तों के बिना किसी भी जीवादि पदार्थोंका सामायिक ऐसा नाम रखना. स्थापना सामायिक सर्व पापका त्याग करनेवाले परिणामोंसे परिणत ऐसे आत्मासे एकरूप हुए. शरीरका जो आकार सामायिक करते समय होता है वैसा ही आकारसाहस्य जिनमें है ऐसे चित्र, फोटो वगैरह पदार्थ में यह सामायिक है ऐसी स्थापना करना यह स्थापनासामायिक है. आगमद्रव्यसामायिक अंगबाह्य श्रुतज्ञान का सामायिक नामका आद्य ग्रंथ है. उस ग्रंथका अर्थ जो जानता है अर्थात् सामायिक रूप आत्मपरिणामका अनुभव जिसको आ चुका था परंतु सांप्रत जो सामायिकरूपज्ञान से परिणत नहीं हुवा है वह व्यक्ति आगमद्रव्यसामायिक है. नो आगमद्रव्यसामायिकके ज्ञायकशरीर, भावि और तव्यतिरिक्त ऐसे तीन भेद हैं, सामायिकको जाननेवाले आत्माका जो शरीर हैं वह भी आत्माके समान सामायिकका ज्ञान होनेमें कारण है, क्यों कि शरीरके बिना आत्माको ज्ञान होता नहीं है, जो पदार्थ जिसके सद्भावमें रहता है या उत्पन्न होता है और जिसके अभाव में उत्पन्न नहीं होता है वह उत्पन्न होनेवाला पदार्थ उसका कार्य समझना चाहिये. शरीरके बिना सामायिकका ज्ञान आत्मा स्वयं अपने में धारण नहीं कर सकता है. अतः वह ज्ञान शरीरका कार्य माना जाता है. अर्थात् ज्ञान और शरीर में हेतुफलव्यवस्था है ऐसा यहां समझना चाहिये. ज्ञानरूप सामायिकका शरीर कारण होनेसे त्रिकालस्थित यह शरीर सामायिक शब्दमे वाच्य होता है. भाविसामायिक — चारित्रमोहनीय कर्म के विशेष क्षयोपशमसे आत्मामें भविष्यत्कालमें जो सर्व सावद्य योगसे निवृत्त करनेवाला परिणाम होगा उसको भावि सामायिक कहते हैं. तद्व्यतिरिक्त नो आगमद्रव्यसामायिक -- क्षयोपशमरूप अवस्थाको प्राप्त हुए चारित्र मोहनीय कर्मको जो कि सामायिकके प्रति कारण है वह नो आगमंद्रच्य तद्वयतिरिक्त सामायिक है, भाश्वास २८३ २
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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