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मूलाराधना
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वह असंयमका त्याग नहीं करता है. यहां इस विवेचनका यह अभिप्राय है कि, संयमका उद्योत करनेवाला तपश्चरण निर्जराका कारण होता है. अर्थात् संयमपूर्वक तप हो तो कर्मकी निर्जरा होती है अन्यथा नहीं होती है. इस लिये संयम तपका परिकर है. इस विषय में पूर्वाचार्य ऐसा कहते हैं " संजमहीणं च तत्रो जो कुणह गिरत्थयं कुणइ " संयमरहित तप जो व्यक्ति करता है वह व्यर्थ ही क्लेश करता है.
संयमका उद्योत करनेके लिये मनमें संक्लेश परिणामको उत्पन्न न करते हुए क्षुधादि बाधाओंको महना चाहिये. उपवास, ऊनोदर, वृत्तिपरिसंख्यान इन तपोंको करते समय भूख प्यासकी वेदनासे मनमें व्याकुलता न होनी चाहिये. अथवा यह तपश्चरण में कैसा धारण करूं ऐसी कायरता छोड देनी चाहिये. आहारके और पानके पदार्थो मनको चलित न करना चहिये. मैं यह पदार्थ भक्षण करूंगा यह पदार्थ पी लूंगा ऐसे मुहसे कथा न करें तथा उस कथा अनादर करें. उपवाससे थका हुआ इधर उधर लोटना छोदे, मैं क्षुधासे पीडित हुआ है, प्यासस मेरेको कट हो रहा है ऐसा वचन न चील अथवा आहारकं दिन याचना न करे.
मैं उपवाससे थक गया हूं इसलिये यह रूखा भोजन में नहीं खा सकता हूं. मेरेको दूध, घी, खांड वगैरह पदार्थ आप देवें ऐसी वचनसे याचना नहीं करनी चाहिये. अथवा यदि यह पदार्थ मिले तो बहुत अच्छा होगा ऐसा मनमें भी विचार न लाना चाहिये. शरीरपर भी इस विचारका कुछ चिन्ह व्यक्त न होना चाहिये, जैसे दाता क्षीरादि पदार्थ देने लगा तो मुख हास्यसे मफुल्लित होना, थंडा और रूक्ष आहार देता हो तो मुखपर कोप प्रगट होना. इस तरह क्षुधादिक परीषह सहन करने चाहिये.
आहारादिककी प्राप्ति न होनेपर भी लाभकी अपेक्षा अलाभसे ही मेरे तपकी वृद्धि होती है ऐसा मनमें विचार करता हुआ अलाभ पपिह सहन करना चाहिये. लोकव्यवहारज्ञ और धार्मिक जन तप और उपस्थिओंका बडा आदर करते हैं, मैं चडा कठिन तप करता हूं तो भी ये लोक मेरा आदर करते नहीं है. यह विचार मनमें लाकर कोपसे संक्लेशपरिणामके वश न हो जाना चाहिये, अथवा सत्कारपुरस्कार परीषह सहन करना नाहिये.
रसका यदि परित्याग किया है तो रसयुक्त आहारकी कथाके तरफ अपने मनको न लगायें रमयुक्त पदार्थका अवलोकन होनेसे उस विषयके आदरभाव को दूर हटाना चाहिये. रसोंका त्याग करनेसे यदि देहमें दाह उत्पन्न हो तो सहन करना चाहिये.
आश्वास
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