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________________ আম্মা মুম্পানি काAstsA Recene यदि इंद्रियकपायापरिणति सर्वथा समानरूप होती तो यहां एक ही विपय दुहराया जानेसे पुनरुक्ति दोप आता परंतु सामान्य और विशेषतासे यहां वह दोष नहीं है. मनोगुप्ति यहां सामान्यरूप है और इंद्रियकषायापरिणति विशेषरूप है अतः पुनरुक्ति दोष यहां नहीं है. इंद्रियकपायापरिणति विशेषात्मक होनेसे मनोगुप्तिम अन्तर्भूत होती है तथापि उसको भिन्नरूपनया दिखानेका प्रयोजन यह है कि, चारित्रका निदोप पालन करनेकी इच्छा रखनेवाले इंद्रियविषय और कपायपरिणति इनका त्याग करें. शंका-चारित्रके तेरा प्रकार है-पांच महाव्रत, पांच समिति, और तीन गुप्ति. समिति और गुप्ति भी चारित्रात्मक हो है अतः उनको चारित्रविनय कहने हैं. परंतु समिनि और गुप्तिको आप यहां चारित्रसे भिन्न दिखाते हैं. क्या यह युक्ति संगत है ? उत्तर-आचार्योंने अन्य ग्रंथों में पांच महावतोंको ही चारित्र कहा है. गुप्ति और ममिति ये महात्रतरूप चारित्रके परिकर है ऐसा इस ग्रंथकारका अभिप्राय है. अन्य आचार्योंने इस विषयमें ऐसा कहा है " कर्मादान निमित्तक्रियाभ्यश्च विरतिरहिंसादिभेदेन पंचप्रकारा गुप्तिसमितिविस्तारसंक्षेपो भवति " मन, वचन और शरीर की क्रिया ही कर्मग्रहण करने में निमित्त है. इस क्रियासे विरक्त होना चारित्र है, चारित्रके अहिंसा, सत्य, अचार्य, इत्यादिरूपसे पांच भेद है. यह संक्षयरूप चारित्र है. और गुप्ति समिति इस भेदसे वह विस्ताररूप है. इस चारित्रविनयकी स्थिरता पचीस भावनाओंसे होती है. 'तत्स्थैर्यार्थ भावनाः पंच पंच' अर्थात । प्रत्येक व्रतकी स्थिरता हो। एतदर्थ पांच पांच भावनाएं आचार्यने कही है. - - - - -- - पणिधाणं पि य दुविहं इंदिय णोइंदियं च बोधव्वं ॥ सद्दादि इंदियं पुण कोधाईयं भवे इदरं ॥ ११६ ।। प्रणिधानं द्विधा मोक्तमिद्रियानिद्रियाश्रयम् ॥ शब्दादिविषम् पूर्व परं मानादिगोचरम् ।। ११७॥ Sare
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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