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________________ मुलागधना आश्वासः धोना अथवा समस्त अवयवोंको धोना. परंतु त्रस और स्थावर जीवोंको बाधा न होवे इसलिये मुनि शीतलजलसे स्नान नहीं करते हैं. स्नानके जलसे कीचड होता है, वालुकादिकोंके मदनसे जलकायिक जीवोंका घात होता है. वनस्पति जीवोंको बाधा पोहोंचती है. मत्म्य, मेंडक, और सूक्ष्म सोंको बाधा पोहोंचती है अत: मुनिगण शीत जारो नान नहीं करते हैं, सदिने पटे पानीको मान नहीं करते हैं, तो गरम पानीसे क्यों नहीं करते हैं? इस प्रश्नका उत्तर यह है-गरम जलमे स्नान करनेसे भी सस्थावर जीवोंका बाधा होती ही है. जमीनके छिद्रोंमें, पडे बडे बिलोंमें वह पानी प्रवेश करेगा तो वहांके चाटी वगैरह प्राणिओंको चाधा अवश्य होगी ही. गरम पानीसे घास, कोमल अंकुर संतप्त होकर महान्कष्टी होते हैं. गरम पानीसे धान्योंका रस नष्ट हो जाता है, मुनिआको जलस्नानकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि, जलस्नानसे सप्त धातुमय देह पवित्र नहीं होता है. इस वास्ते शुचिताकेलिये स्नान करना भी योग्य नहीं है, रोगपरिहार करनेके लिये भी स्नानकी आवश्यकता नहीं है. यदि वे स्नान करेंगे तो रोगपरीपह सहन करना व्यर्थ होगा. शरीर सौंदर्य युक्त होनेकेलिये भी ये स्नान नहीं करते हैं क्यों कि वे वीतराग है. मुनि श्री, तेल इत्यादिको अभ्यंगस्नान भी बुर प्रयोजन न होनस करते नहीं है, घृतादि क्षारपदाथों का स्पर्श होनेसे भूमि वगैरह में रहनेवाले जन्तुओंको पीडा होती है. भूमिपर चिपकं हुए त्रस जीव इधर उधर होते हैं. गिरते हैं तब उनको एकस्थानसे दूसरे स्थानपर जाते समय बाधा पोहोंचती है. वृक्षोंक मुलभाग, छाली, फल, पत्ते इत्यादिकोंका चूर्ण करनेमें, पीसनेमें महान् असंयम होता है. नख निकालना, घिसना, रंगाना इत्यादि कार्यको नखसंस्कार कहते हैं. ओठाका मल निकालना, उनको रंगाना अधिक लाल दीखने लायक बनाना यह ओष्ठसंस्कार है. हाथोंके द्वारा वर्पण करके स्निग्धता उत्पन्न करना यह केश संस्कार है. दाही और मूंछोपर भी हात बार बार फेरकर स्निग्धता उत्पन्न करना यह श्मश्रुसंस्कार है. कान हस्य हो तो उनको दीर्घ करना, दीघ हो तो उनको छोटे बनाना, उसमें से मल दुर करना, उनको अलंकारासें भूपित करना यह कणसंस्कार है. कुछ उबटन वगैरे पदाथ लगाकर मुहको तेजस्वी बनाना. अथवा मंत्रके द्वारा मुहको तेजस्वी करना यह मुखसंस्कार है. आंखे स्वच्छ धोना, वे अंजनसे आंजना यह नेत्रसंस्कार है, जो केश इधर उधर तिरछे ऊगे हैं उनको निकाल देना, दीर्घ केशोंको हस्व करना, उन्नत बनाना यह भोहोंका संस्कार है. T
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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