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________________ मूलाराधना आश्वास 17 BHARuter है, यह संवर ही मुक्कीका उपाय है. जबतक नचान काँका निरोध न होगा तबतक निर्जरा होकर भी कुछ आत्माका कल्याण न करेगी, अर्थात संवर पूर्वक निर्जरा ही मुक्तिका उपाय है. तोत्रमे स्वाधीनता गुण प्राप्त होता है, केशोंपर जो प्रेम करता है वह मस्तक धोनेमें, केशप्रक्षालन करनेमें, उनको मुखानेमें, प्रयत्न करता है. इसके इन कृत्योंसें स्वाध्याय ध्यानादिकोंमें विघ्न उपस्थित होता है. अतः वह इन कृत्यों में लगनेस पराधीन हुवा है ऐसा समझना चाहिये, लोच करनेसे उपर्युक्त कृत्य नहीं करने पडते हैं तथा स्वाध्यायादिक स्वकृत्यों में लगनेसे वह स्वार्थान कहा जाता है. लोच करनेसे निदोषता गुण मिलता है. चोरी करना, झूट बोलना यह सदोष क्रिया है. मुनिराज अनशनादिक निदोष क्रिया जैसी करते हैं वैसा लोच भी निर्दोष क्रिया होनेसे वे इस क्रियाको भी करत हैं. लोचसे देहममता नष्ट होती है. यह देह मेरा है ऐसी भावना नष्ट होती है. तथा लोचसे शौचधर्मकी प्राप्ति होती है, प्रकृष्ट लोभकी निवृत्ति होना शौच है. शरीरपरसे लोभ नष्ट होगया तो समस्त लोभोंके प्रकारका नाश होता है. शरीरके उपकारके लिये ही बंधु धनादिकांक ऊपर लोम उत्पन्न होता है. इन लोभोंका नाश होनेसे शौचधर्म संचरका कारण होता है. क्योंकि गुप्ति, समिति, धर्म अनुप्रेक्षा,और परीपह जय संवरके कारण है ऐसा पूर्वाचार्य कहते हैं. आणविखदा य लोचन अपणो होदि धम्मसट्टा च ॥ उम्गों नबो य लोचो तहेब दुक्खस्स सहणं च ।। ५२ ॥ आत्मीया दर्शिता अन्द्रा धर्म लोचं वितन्वता ।। भावितं सकलं दुराचं दुश्चरं चरितं तपः॥ ९३ ॥ इति लोचः ॥ विजयोदया-आणवियदा य होदि आदर्शिता भवति । सोचेण लोचेन । का? धम्मसट्टा धर्म चारि धद्धा । कस्य ? चप्पणी आत्मनः । महती धर्मस्य श्रद्धाऽन्यथा कथमि दुःसहं केशमारमते इति । आन्मनो धर्मशक्षाप्रकाशनेन परस्थापि धर्मश्रज्ञाममनोहपां वृत मवति । सोऽयमुपहणाल्यो गुणी भाषितो भवति । उग्गो तबो य जुग्ग्रे च तपः २२८
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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