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गुलाराधना
आश्वासः
अर्थ-अपवादलिंगधारी ऐलकादिक भी अपनी चारित्रधारणशक्तीको न छिपाता हुवा कर्ममल निकल जानेसे शुद्ध होता है. क्योंकि वह अपनी निंदा ब गहीं करता है और मन, बचन व शरीर ऐसे तीन योगंपूर्वक परिग्रहकात्याग करता है, संपूर्ण परिग्रहका त्याग करना ही मुक्तिका मार्ग है. परंतु मेरेको परीषहाँका डर होनेसे पापोदयसे मैने वस्त्र पात्रादिक परिग्रहका ग्रहण किया है ऐसी मनमें पश्चातापपूर्वक वह निंदा करता है. तथा सुचीदिनांके सभी अपनी निंदा करता है. यह निंदा और गही ऐसे दो परिणामोंसे युक्त होकर परिग्रह स्वल्प करना जाता है अतः उसके पूर्वकर्मकी निर्जरा होकर आत्मद्धि होती है. इस तरह अचेलताके गुणोंका वर्णन किया. यह अचनशा मुनियोंके अहाईस मूलगुणो से एक मूलगुण है.
अनि मैने वस्त्र पाह, संपूर्ण परि
कालांचाकरण के दोपा या परिहणु लोचोऽनुष्टीयते इल्परकायां दोषप्रतिपादनायोत्तरं गाधाइयम्
केसा संसज्जति हु गिप्पडिकारस्स दुपरिहारा य ।। सयणादिसु ते जीवा दिछा आगंतुया य तहा ॥ ८८ ॥ संस्काराभावतः केशाः संमूच्र्छन्ति निरन्तरम् ॥
विशन्त्यागन्तवो जीवा दूरक्षाः शयनादिषु ।। ८९ ॥ विजयोदया-केसा केशा: 1 संसज्जति दु खुशद पवकारार्धः । यूकामिक्षोत्पतेराधारभावमुपवजन्त्येय । कस्य केशाः ? णिप्पडियारस्स निष्क्रान्तः प्रतीकारात् निष्पतीकार । प्रतीकारशः सामान्यवननोऽयि संसजमस्य प्रकृतत्वात् संसजनप्रतिकार एव वृत्तो गृह्यते । तैलाभ्यंगगंधादिप्रक्षेपजलप्रक्षालनादिक्रियामकुर्वत इत्यर्थः । ते च सम्मूचनामुपगता यूकादयः ।दुपरिद्वारा य दुःखेन परिडियन्ते। क सयणादिसु शयनं शय्योपगमनं, शिरसा कस्यचिदवष्टंभने । निद्रामुद्रितलोचनस्य पतनं परयशस्थ सतः आदिशग्दन गृख्यते । बाधा जीषेभ्यः कथंचिदन्यदेशकालस्वभावभेदात् । ततःपाधाय दुष्परिहारायां जीषा एध दुष्परिहारा पक्ष भवंतीति मन्यते । अन्यथा इस्तेनापनेतुं शक्याः कर्थ दुष्परिहाराः स्युः। न केवल तत्रोत्पन्ना एक दुपरिबारात्तथा तेनैव प्रकारेण जीवाः मागेतुका य अभ्यत आगतान कीटादश । पतेन हिंसादोष आख्यातः॥
मूलारा-केमा संराउति खु यूकालिश्रोत्पत्तेराधारभावमुपप्रजन्त्येव । णिपडियारस्स स्नानादिप्रतीकारमकुर्वतः । दुपारीत्यादि-स्वाध्यायादिखिन्नस्य शिलातलादी सेवेशन, आदिशब्देन शिरसा करयाचदवष्टंभन, निद्रामुदितलोचनस्य