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मूलारावना
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चौरादिसे कैसा रक्षण करूं ऐसी चिन्ता निष्परिग्रहीको सेती नहीं, अतः वत्रिक स्वदका नाश होनेसे लघुता गुण प्राप्स जाता है.
अप्रतिलेखन - जो सबखलिंग धारण करते हैं उनको वत्रखंडादिकको बहुत शोधना पडता है, परंतु मयूरपिच्छादिमात्र परिग्रह जिनके पास हैं उनको बहुत सोधनेकी आवश्यकता नहीं रहती है. अतः अप्रतिलेखन गुण उनको प्राप्त होता है.
परिकर्मवर्जनात्रके विषयमें याचना करना, उसको मीना, धूपमें सुखाना, जलसे धोना, वगैरे अनेक क्रियायें करनी पड़ती है. तब ध्यान, स्वाध्यायादि कार्यमें विघ्न उपस्थित होता है. परंतु जो मुनि अंचल है का त्यागी है उसको याचनादिकार्य करना नहीं year है अतः उसके ध्यानस्वाध्यायादि क्रियाये निर्मित पार पडती है,
गतभयत्व निर्वस्त्रमुनीश्वरको परिग्रहाभाव होनेसे भय रहता नहीं भय से जिसका चित्त व्याकुल हो उठा है उसकी रत्नत्रयमें प्रवृत्ति होती नहीं सब मुनि वस्त्र में यूकादिसम्पूर्च्छन जीवोंका परिहार करनेमें असमर्थ होता है. परंतु वरहित पुनि उन जीवोंका परिहार कर सकता है,
परिपहाधिवासना - नग्न मुनि शीत, उष्ण, देशमशकादि परीपह सहन करते हैं. परंतु वत्रेष्टित यति को शीतादि बाधा होती नहीं. अतएव वे शीतादिपरीह विजयी नहीं हैं. पूर्वोपार्जित कर्मकी निर्जरा करनेके लिये परीषद सहन करने चाहिये ऐसा आगमवचन है इसलिये निर्जराथीं मुनिओने परिषह सहन करने चाहिये.
बिस्सासकरं रूवं अणादरो विसयदेहसुखे ||
सव्वत्थ अप्पवसदा परिसह अधिवासणा चेव ॥ ८४ ॥ अङ्गाक्षार्थसुखत्यागो रूपं विश्वासकारपणम् ॥
परीषहसहिष्णुत्वमर्हदाकृतिधारणम् ॥ ८५ ॥
विजयोदया - विस्वासकरं रूपं विश्वासकारि जनानां रूपं असतात्मकं । एवं असंगा नैतेऽस्यन्ति नापि परोपकारि शस्त्रग्रहणं प्रच्छन्नमा संभाव्यते । विरूपषु वामीषु नास्मदीया स्त्रियोरागमनुबध्नंतील विश्वासः ॥
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