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__ मूलाराधना
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हिंदी अर्थ ---उत्सगलिग नयतापामा मतपत-सीर स्थिर रहने के लिये कारणीभूत जो आहार उसकी प्राप्ति होनेके लिये कारणरूप चिन्ह है. गृहस्थवषसे ही यदि भिक्ष भी रहने लगे तो ये गुणी है ऐसा नहीं समझे जायेंगे तथा उनका आदर न होगा. गृहस्थवषसे उनके विशिष्ट गुण ज्ञात न होनेसे गृहस्थ उनको दान नहीं देंगे. दान न मिलने उनके शरीरकी स्थिरता न होगी, शरीरस्थितीके बिना रत्नत्रयभावनाका प्रकर्ष कैसे होगा ? रत्नत्रयके प्रकर्षसे ही मुक्ति प्राप्ति होती है. उसके चिना वह न मिलेगी. अतः अभिलषितकार्य अर्थात् मुक्तिप्राप्ति गृहस्थवेषसे होती नहीं. अतः यह नाता गुणीपनाका सूचक चिन्ह है. इस नातागुणसे दानादिकार्यपरम्पराकी सिद्धि होती है.
__ अथवा यात्रा शब्द सामान्य गतिवाचक है जैसे 'देवदत्तस्य यात्राकालोऽयम्' अर्थात् यह देवदत्तका गमनकाल है. यहां यद्यपि बात्राशन्द सामान्य गतिवाचक है तो भी प्रस्तुत प्रकरणमें वह शिवगति-मोक्षगमन इस अर्थमें रूह समझना चाहिये. 'दारकं पश्यसि' इस वाक्यमें दारकशब्दका सामान्य अर्थ लडका ऐसा होनेपर भी जो लडकेको देख रहा था उसका ही पह लड़का है ऐसा अभिप्राय सिद्ध होता है उसी तरह 'जत्तासाधणचिन्हकरणं ' इस शब्दसमुच्चयका अर्थ यात्राका अर्थात् मोक्षगतिका साधन जो रत्नत्रय उसका नयता यह लिंग ध्वजके समान है. .
___ इस लिंगमें जगत्प्रत्ययता यह गुण है. 'जगत्प्रत्ययः ' अर्थात् सर्व जगाकी इसके ऊपर श्रद्धा होती है. जगत् शब्दका चेतनअचेतनरूप संपूर्ण द्रव्यसमूहको जगद् कहते हैं ऐसा अन्य प्रकरण में अर्थ होगा. 'जगन्नकावस्थं युगपदाखिलानंतविषयम' अर्थात् चेतनाचेतनरूपी इस जगतकी एक अवस्था नहीं है, यह संपूर्ण और अनंतपर्यायाको धारण करने वाला है, परंतु प्रस्तुतप्रकरणमें जगत् शब्दका अर्थ प्राणिनिशा ही लेना चाहिये. जैसे 'अहतखिजगद्यान' अथीत इंद्र, देव, मनुष्य व सिंहादितिर्यच ऐसे विशिष्टप्राणियोग वंदनीय जिनेश्वरको हम नमस्कार करते हैं. यहां जगत् शब्दका विशिरपाणी ऐसा अर्थ होता है. प्रत्ययशब्दक भी अनेक अर्थ है. जसे 'घटस्य प्रत्ययः घटका ज्ञान यहां प्रत्यय शब्दका ज्ञान ऐसा अर्थ होता है, तथा प्रत्यय शब्द कारणवाचक भी है जैस' मिध्यात्वप्रत्ययः अनंतः संसारः ' अर्थात् इस अनंतसंसारको मिथ्यात्व कारण है. प्रत्यय शब्दका श्रद्धा ऐसा भी अर्थ होता है जैसे 'अय अत्रास्य प्रत्ययः' इस मनुष्यकी इसके ऊपर श्रद्धा है' यहां प्रस्तुत प्रकरणर्म प्रत्यय शब्दका श्रद्धा यह अभीष्ट अर्थ है.
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