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भूलाराधना
आश्वासः
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होनेसेही हो सकता है. परशा नहीं है. खातामयाभारम्पयोगकी हानि करनेवाली है. किसी भी इष्टानिष्ट विषयमें रागद्वेषरहित मनोवृत्ति होना ही समता है. वस्तुके यथार्थ स्वरूपको जानने चित्तसी एकाग्रता होनाही योग अथवा ध्यान कहते है. जत्र वस्तुके यथार्थ ज्ञानको निश्चलता प्राप्त होती है तब उसको ध्यानसंज्ञा प्राप्त होती है. बुढापेसे ज्ञानमें अस्थिरता आती है तब ध्यानका विनाश होता है. अर्थात् ध्यानका नाश करनेवाली वृद्धावस्था शरीरको जब जर्जर करती है तब मुनिराज भक्तपतिज्ञामरणसे देहोत्सग करते है. सामान्ययोग इस शब्द का अर्थ इस तरहसे भी आनार्य करते हैं-समता शब्दका अर्थ उपर लिखा है. निर्जगीं मुनि जिससे संयुक्त होते हैं वह योग है अर्थात् यहां कायश्लेशको योग कहना रूद है, आतापनादिकायतशतपको योग कहते हैं यह बात प्रसिद्ध ही है, 'आदावणादिजोगधारिणो अणगाग' आतापनादि योगोंको धारण करनेबाले मुनियोंको अनगार कहते हैं ऐसा आगममें कहा है. जराजजेरित होनेसे उपयुक्तयोग धारण करनेमें शरीर समर्थ नहीं रहता है,
सामण्ण जोग' इस शब्दसमूहमें योग शब्द अल्पस्वरयुक्त होनेसे द्वंद्व समासमें उसको प्रथम नियुक्त करना चाहिये. इस प्रश्नका उत्तर यह है कि, समता अर्थात् सामण्ण प्रधानरूप है, महत्वयुक्त है, जिसमें महत्त्व रहता है उसको द्वंद्व समासमें प्रथम नियुक्त करते हैं. समतारहित केवल तप विपुल निर्जराका कारण नहीं होता है. अतः तपश्चरणमें निर्जराहेतुत्ता स्वयं नहीं है किंतु वह समताका साहाय्य पाकर होती है,
देवोंका उपद्रव, मनुष्यकृत उपद्रव तथा तियंचकृत उपद्रव इन उपद्रवामेसे किसी भी उपद्रवसे निष्प्रतीकार पीटा हो जानेसे मुनि भक्तप्रत्याख्यान मरणके योग्य माने जाते है..
उपसर्गके चार भेद है. परंतु तीन उपसर्गकाही यहाँ उल्लेख क्यों किया है ?
उत्तर-'उचसग्मा वा' इस गाथोक्त शब्दोंमे 'या' शब्द समुच्चयार्थक समझना चाहिये, अतः अचेतन उपसर्गका भी यहां समुच्चय होता है.
अणुलोमा वा सत्तू चारित्तविणासया हबे जस्स ॥ दुभिक्खे घा गाढे अडवीए विप्पणठो वा ॥ ७२ ॥