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________________ मूलाराधना आवास न केवलं फलातिशयाकारिथं आईसादिगुणानां अपि तु मिथ्यात्वकटुकिते स्थिता दोपानपि कुर्वन्ति त्याच जह भेमजं पि दोसं आवहइ विसेण संजुदं संतं ।। तह मिश्राविराजुदा गुणा वि दोसावहा होति ॥ ५८ ।। सर्वे दोषाय जायन्ते गुणा मिथ्यात्वदाषताः ॥ · किमौषधानि निमंति सविषाणि न जाचितम् ॥ ६३ ॥ विजयोदया-यथा भेस पि इति स्पष्टतया न व्याख्यायते । मिच्छत्तविसशुदा मिथ्यात्वन विषण संयशाः गावि गुणबी सिलवणा अपि । दोसावहा दोषावहाः संसारे चिरपरिभ्रमणदोषमावदन्तीत्यर्थः । अथवा मिथ्यार गुणाः पापानुषंधि स्वल्पमिद्रियसुखं दवा बहारंभपरिग्रहादिषु आसक्तं नरके पातयन्ति इति दोषापहाः। रशन्तप्रदर्शनेन इष्टनितिः माप्तिश्च मिथ्यात्वमाहात्म्यान भवतीति प्रमाणेन वर्शषितुं गाथाडूयमायातम् । न केवल मरणे मिथ्यात्य पिता आहेसावयः फलातिशयाश्यति कि तहि दोषमपि कुर्वन्ति इत्याह मूलारा-आवहादि करोति । दोसावदा संसारे चिरभ्रमणकारिणः । अयचा मिथ्यारगुणाः पापानुबन्धि स्वल्पमिद्रियसुसं दत्वा बहारंभपरिमहादिष्वासक्तं कृल्या नरके पासपन्ति इति दोषावहाः ।। उन दोषोंका आचार्य एवं प्रकारसे वर्णन करते हैं-- अर्थ -- औषध यद्यपि गुण करनेवाला होता है तथापि वह यदि विषमिश्रित होगया हो तो बह दोषयुक्त होता है, अर्थात् उसके सेवनसे मनुष्यकी हानि होती है. उसी तरह अहिंसादिगुण जब मिथ्यात्वसे युक्त होते हैं तब ये गुण होते हुए भी संसारमें दीर्घकालतक परिभ्रमण करानेवाले दोषोंको धारण करते हैं. अथवा मिथ्यारष्टिके ये अहिंसादिगुण पापानुबंधी स्वल्प इंद्रियसुखकी जीवको प्राप्ति कर देते हैं. परंतु उसको बहु आरंभ और परिग्रहोंमें आसक्त करके नरकमें ले जाते हैं अतः ये मिथ्यात्वक्षित अहिंसादिगुण दोषाको उत्पन्न करते हैं ऐसा समझना चाहिये, विपमिश्रित औषधसे आरोग्यका लाभ होता नहीं वैसे मिथ्यान्वयुक्त अर्हिसादिकगुणोंसे जीवको मोक्ष प्राप्त होता नहीं ऐसा समझना चाहिये,
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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