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________________ मूलाराधना आचार ८ FRE तदुपक्रमयमौचित्यविधेचनामाह- . . मूलारा-पच्चजाए सुयो वीक्षामहणयोग्यः । अविख्यापनार्थमिदं । एवमुत्तरपदानामपि लिंगादिविकरम | विधिल्यापनेन साफल्यमवकरूप्यम् । ४वसंपब्जिन्तु प्रतिपद्य । लिंगकाप निर्मन्धानुष्ठानम् । विणयसमाधीर विनये समाधौ | च । बिरिता परिणतो त्या । अत्रामाविपचतयो विश्चितता अर्थ-जो दीक्षाग्रहण करने योग्य है. ऐसा मुनि योग्य लिंग धारण कर श्रुत-आगममें अवगाहन करता है. तथा विनयम और समाधि विहार करता है. तात्पर्य यह है कि, सविचारभक्तप्रत्याख्यान मरण में जैसा प्रयोग विधि बतानेके लिये अई, लिंग, शिक्षा वगैरह चालिस सूत्रोंका पूर्व में वर्णन किया है. वैसा यहां भी ६ वही वर्णन समझना चाहिये। णिप्पादिता सगणं इंगिणिविधिसाधणाए परिणमिया ॥ सिदिमारुहितु भाविय अप्पाणं सल्लिहिताणं ।। २०३२ ॥ ___... निष्पाद्य सकलं संई इंगिनीगतमानसः ॥ ..... श्रितिस्थी भारितस्वान्तः कृतसल्लेखनाविधिः 11 २१०४ ॥ - विजयोदया-पिप्पावित्ता समणे योग्यं कृत्वा स्वगणं । इंगिणोविधिसाधनाय परिणतो भूत्वा, सिदिमादितु' | परिणामणिमारुख भाषिय भावना प्रतिपय । मप्पा सद्धिहिलाण आत्मानं संलेख्य ॥ । मूलारा--णिप्पादिता योग्य कस्वा । इंगिणी विधिसाधनांयामित्यत्रापि योग्यं । परिणभिय परिणम्य । सापयिध्यामहर्मिगिणी विथिमिति निश्चलं चेतासे निवेश्येत्यर्थः । सिदि शुभपरिणामश्रेणी । भाषिय फेदपोदिदुर्भपनात्यागेन शमलतादिभावनाभिः संस्कृत्य । सलिहिताणं कायकषायौ कृशीकृत्य | अर्थ-अपने गणको सौनओके चरण में योग्य बनाकर तदनंतर इंगिणी मरण साधनेके लिये वह मुनि परिणति करता है. तदनंतर परिणामके श्रेणीपर आरोहण कर कंदादि भावनाओंका त्याग कर तपोभावना, श्रुत भावना, इत्यादि भावनाओंका अभ्यास करता है और शरीरके साथ कपायं कुश करता है. १७७
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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