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________________ मूलाराधना आश्वास भोगे अणुत्तरे भुंजिऊण तत्तो चुदा सुमाणुस्से ॥ इष्टिमतुलं गहना गति जिणदेसियं धम्मं ।। १९४२ ।। भुक्त्वा भोग च्युताः सन्तो भूत्वा भुचि नरोत्तमाः ।। विहाय महती भूर्ति भूत्वा सिध्यन्ति साधवः । २०२२ ॥ विजयोदया-भोगे अणुत्तरे भोगानुत्कृष्टान भुक्त्या स्वर्गच्युता मनुष्यभवेऽपि प्राप्य सकलामृद्धि तोच त्यक्या जिनाभिहितं धर्म चरति ।। मध्यमाराधनाजघन्याराधकानां स्वर्गसुलभुक्त्युत्तरकालभोग्यसुखं कृत्यं चोपदिशतिमूलारा-अणुत्तरे उत्कृष्टान् । तत्तो चुदा स्वर्गादवतीर्णाः । पत्ता त्यक्त्वा । धम्म चारित्रम् ।। अर्थ-आराधकजीवोंको स्वर्गमें भोगोंकी प्राप्ति होती हैं. उनका भोग लेकर आयुष्य समाप्त होनेपर घे स्वर्गस च्युत होकर इस मनुष्यभवमें जन्म धारण करते है. इस मनुष्यमवमें भी संपूर्ण ऋद्धिकी उनको प्राप्ति होती है. उसको छोडकर वे बिनधर्मका पालन करते हैं अर्थात् मुनि होकर तप, स्वाध्याय और ध्यान करते हैं. सदिमंतो धिदिमतो सदासंवेगवीरियोवगया ।। जेदा परीसहाणं ऊबसग्गाणं च अभिभविय ॥ १९४३ ॥ धृतिस्मृतिमतिश्रद्धावीर्यसंवैगभागमः ॥ परीषहोपसर्गाणां जेसारी विजितेन्द्रियाः ॥ २०२३ ।। बिजयोदया-सदिमंतो स्मृतिमंतः धृतिसमन्विताः श्रद्धासंधेगवीर्यसहिताः परीपहाणां विजेतारः उपसर्गा. मामभिभवितारः । धर्म चरंतस्तरकीदृशाः स्युरित्याइमूलारा-सदिमता स्मृतियुक्ताः । जेदा जेतारः । अभिभविदा अभिभवकर्तारः । अर्थ-वे शास्त्रका अध्ययन करके उसके तत्वों को खूब ध्यान में रखते हैं. परीषह और उपसर्ग प्राप्त होने. | १७१८
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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