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________________ मूलाराधना आश्वास कप्पोवगा सुराज अग्छरसहिया सुहं अणुहवंति ।। ततो अर्णतगुणिदं सुई दु लवसत्तमसुराण ॥ १९३५ ।। सुस्वं साप्सरसो देवाः कल्पगा निर्विशति यत् ॥ संतोऽनंत गुणं स्वस्थं लभंते लवसत्तमाः ॥२.१५ ॥ विजयोव्या कप्पोवगा सुरा जंकल्पोपन्नाः सुराः अप्सरोभिस्तहिता यत्सुखमनुमति ततोऽप्यनंतगुणितं सबससमकाला। तत्सुनपरिमाणमाद्द--- मूलारा कप्पोवगा कल्पोपपन्नाः। अर्थ-अप्सराओंके साथ सौधर्मादिक कल्पवासी देव जिस मुखका अनुभव लेते हैं उससे भी अनंत गुणित सुख अहामंद्र देवाको मिलता है, जाणम्मि दंसणम्मि य आउत्ता संजमे जहक्खाद ।। वद्रुिदतवोवधाणा अवहियलेस्सा सदमेव ॥ १९३६ ॥ विशुद्धदर्शनज्ञानाः सयथाख्यातसंयमाः॥ शन्वामिललश्याका यद्धेमानतपोगुणाः ।। २०१६ ॥ विजयोदया-गाणम्मि सम्मि य ज्ञानदर्शनयोर्यथास्पाने च संयमे यायुक्ता वार्द्धतपोऽभिप्रहाः सततं विशुद्धलेश्याः क्षएकाः ॥ मूलारा-आउत्तो आसक्ताः । अवहिदलेस्सा संशुद्धलेश्याः ॥ अर्थ-सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और यथारख्यात चारित्र इनमें हमेशा तत्पर रहनेवाले तथा तपोंके नियम जिन्होंने बढाये हैं, जिनकी शुभलेश्यायें उत्तरोतर विशुद्ध होती है ऐसे धपक पजहिय सम्म देहं सददं सञ्चगुणावद्विदगुणवा ॥ दोवदधरमठाणं लहंति आराधया खवया ॥ १९३७ ।। १७१५
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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