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प्रयागधना
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विशेषार्थ — उपगूहन - उपगूहन अथवा उपग्रहण ऐसे इस गुणके दो नाम है. उपण इसका अर्थ बढाना ऐसा होता है, 'बृह यहि वृद्धी' इस धातूसे बृंहण शब्दकी उत्पत्ति होती है. उप इस उपसर्गके योगसे वृद्द धातुका अर्थ बदला नहीं है. स्पष्ट, अग्राम्य, कान और मनको प्रसन्न करनेवाला, वस्तूकी यथार्थता भव्योंके आगे दर्पण के समान दिखानेवाला, ऐसे धर्मोपदेशके द्वारा तत्त्वश्रद्वान बढाना यह उपहण गुण हैं.
उपबृंहण - इंद्र प्रमुख देवोके द्वारा जैसी महत्वयुक्त पूजा की जाती हैं वैसी जिनपूजा करके अपनेको जिनधर्ममें, जिनभक्तिमें स्थिर करना अथवा दुर्धर तपश्वरण वा आतापनादि योग धारण करके अपने आत्मामें श्रद्धा गुण उत्पन्न करना इसको भी उपबृंहण कहते हैं.
स्थितिकरण - जीवादिक पदार्थ सामान्य और विशेष धर्मोसे युक्त हैं अर्थात् चेतनत्व, स्पर्शादिमत्त्व, गति हेतु होना इत्यादि विशेष धर्म और अस्तित्व, वस्तुत्व, प्रमेयत्व, द्रव्यत्य, इत्यादि सामान्य धर्मोसे युक्त हैं. जीवादि छहो द्रव्योंमें उत्पाद, व्यय और श्रव्य यह स्वरूप सदाही प्रतिसमय रहता है ऐसा जिनोपदेश है और वह बिलकुल सच है ऐसी मेरी श्रद्धा है, मैं इससे उलटी श्रद्धा धारण नहीं करूंगा. जिनेश्वर वीतराग हैं अर्थात रागद्वेष, क्षुधा तृषादि अठारह दोपोंसे वे पूर्ण अलिप्त हैं. उनमें संपूर्ण पदार्थ जाननेवाला ज्ञान है. अतः कभी भी विपरीत उपदेश नहीं देते हैं. भव्यजीवका संसारसे उद्धार करनेका प्रयत्न करनेवाले जिन भगवान् क्या वस्तुका विपरीत स्वरूप कहेंगे । ऐसी भावनाओंसे अपनेको जैन धर्ममें स्थिर करना यह स्थिती करण है.
जो भव्य रत्नत्रय चलित हुबा हो तो उसको फिर रत्नत्रयमें स्थिर करना चाहिये. जो सम्यग्दृष्टि भन्य सम्यग्दर्शनसे भ्रष्ट होकर मिथ्यात्वी बननेके स्थित आरहा हो तो फिर उसको सम्यग्दर्शनमें स्थिर करना चाहिये. " मिध्यात्वही कर्मग्रहण करनेका मूल कारण है. मिध्यात्व अविरति प्रमाद, कषाय और योग ये कर्मबंधन के कारण हैं, इन कारणोंसे जीवको अनंत संसारमें भ्रमण करना पडता हैं, चौरासी लक्ष योनियोंमें इन ही कारगोसे जीव भ्रमण करता है. परंतु जब जीवको सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होती है तब नानाप्रकारकी यातनाओं की उत्पत्ति करनेवाली तिर्यग्गति और नरकगति दल जाती है. अर्थात् सम्यग्दर्शन धारण करनेवाला मनुष्य तिर्यचोंमें और नरकों में उत्पन्न नहीं होता है, स्वर्गलोकके और मनुष्यलोकके अनुपम भोग, मान्यता, सौख्य वगैरह उत्कृष्ट पदार्थ
भश्वरसा
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