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________________ मूलाराधना १६६१ स्वस्पेभ्याख्यातं भवति । कयेन सर्वाणि कर्माणि मिन्नस्थितिकानि सहकारिकारणानां द्रच्य क्षेत्रादीनां युगपदसाभिघ्यादुदयं सर्वस्य नोपसंति, ततो यदद्यप्राप्तं सर्वेषागच्छति नेतरदिति । तषेण पुणो तपसा पुनः । कम्मस्स सम्धरूस वि कर्मणः सर्वस्यापि निर्जरा भवति ॥ सर्वसाधारण्या विपाकज निर्जराया इसरानजेरायाः सुतरां विधेयतां दर्शयितुं विशिष्टतां भावयति मुलारा-- उदयसमयागवस्स अनुभवसमयावलिकाप्रविष्टस्य दसस्य फलस्येत्यर्थः । पिन्जरा अपगमः । एतेन विपाकनिर्जरा स्वल्पेत्युक्तं भवति । सव्वस्स उदितस्यानुदिवस्य ॥ उक्तं च- काले निर्जरा नूनमुदीर्णस्य कर्मणः || ahar क्रियमाणेन कर्म निर्जीर्यतेऽखिलं || एतेन नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ॥ अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम ॥ सिद्धान्तोक्तः प्रत्युक्तः ॥ इत्येकांत इन दो निर्जराओं में कोन किसकी होती है ? इस प्रश्नका उत्तर--- अर्थ --जो तपश्चरण में प्रवृत्त हैं अथवा नहीं है ऐसे लोकोको अर्थात् मिध्यादृष्टि वगैरह किंवा सम्यग्दृष्टी वगैरहको कर्म उदयपंक्ति में प्रवेशकर अपना फल देकर नष्ट होता है यह विपाकनिर्जराका स्वरूप है. यह विपाक निर्जरा अल्प होती है. क्योंकि सर्व कमोंकी भिन्न भिन्न स्थिति रहती है. द्रव्य क्षेत्रादिक सहकारी कारण सबके एकदम नहीं मिलते हैं इसलिये कर्म एकसाथ उदयमें आकर फल देकर नष्ट नहीं होता है जो उदयमं आता है वही फल देकर नष्ट होता है अन्य नहीं. और तपश्चरणके द्वारा सर्व कर्मकी निर्जरा होती है. ण कम्मर अबेदिदफलस्स करसइ हवेज्ज परिमोक्खो || होज्ज व तरस विणासो तबग्गिणा उज्झमाणस्स ॥ १८५० ॥ अनिर्दिष्टफलं कर्म तपसा दह्यते परम् || हुताशनेनेव बहुभेवमुपार्जितम् || १९२२ ।। आश्वास 9 १६६१
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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