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________________ मूलाराधना १६५८ अर्थ - परीषद के समूह के द्वारा पीडा होनेपर भी रत्नत्रयको धारण करनेवाले यतिओने स्मृतिका त्याग नहीं करना चाहिए अर्थात् तपके साथ रत्नत्रयकी आराधना करनी चाहिये. संघरानुप्रेक्षा समाप्त निर्जरानुप्रेक्षोध्यसे इय सब्वासवसंघरसंबुडकम्मासवो भवित्तु मुणी ॥ कुवंति तवं विवि सुत्तुतं निजराहेदुं || १८४५ ॥ यो सुनिदि शुद्धात्मा सर्वथा कर्मसंवरम् ॥ करोति निर्जराकांक्षी सिद्धये विविधं तपः ॥ १९१७ ॥ विजयोदया - श्य पर्व । सव्वासयसवर उक्त संस्कारैः संकम्मासवों भवित्तु मुणी संवृतकर्माच भूत्वा मुनिः करोति विविधं तपः सूत्रोकं निर्जराहेतु ॥ धर्म्यं व्यापयितुं द्वादशगाथाभि र्निजेरामनुचितविध्यन्नादौ संवृतानां सूत्रोक्तविचित्रतपसा निर्जरां भावयतिमुहारा संबुद्ध निरुद्धः । भवितु भूत्वा ॥ निर्जरानुप्रेक्षा का वर्णन - अर्थ - इस प्रकार से संवरके प्रकारोंसे जिसने कमौके आय का निरोध किया है ऐसा मुनि निर्जराका कारण ऐसा सूत्रोक्त तप करता है. तवसा विणा ण मोक्खो संक्रमित्रोण होइ कम्मस्स || उवमोगादीहिं विणा धणं ण हु खीयदि सुगुतं ॥ १८४६ ॥ न कर्मनिर्जरा जन्तोर्जायते तपसा बिना । संचितं क्षीयते धान्यमुपयोगं बिना कृतः ॥ १९१८ ॥ विजयोदया - तसा विणा तपसॉतरेण न कर्ममोक्षो भवति संवरमात्रेण । सुरक्षितमपि धनं जैव दीयते । उपभोगमंतरेण । तथा तस्मात् तपोनुष्ठातथ्यं निर्जरार्थ का सा निर्जरा नाम पूर्वकृसकर्मशातनं तु निर्जय ॥ आश्वासा ७ १६५८
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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