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________________ मृलाराधना आश्वास पशुत्वरूपसे जो संसारमें पर्याय धारण करने पड़ते हैं उसको भवसंसार कहते हैं. नरकगति, मनुष्यगति, पशुगति पद पतिओंमें जाना सायुष्य प्राप्यता सिध्यत्वका आश्रय करनेसे इस दिने भ्रमण किया है. देवगतिमें भी मिथ्यात्वयुक्त बनकर जघन्य आयुष्यसे नौचे ग्रैवेयकतक उत्कृष्ट आयुष्य धारण कर इस जीवने भ्रमण किया है. ऐसा मवसंसारका वर्णन किया है. इससे योनिओंका यहाँ मव शब्दसे संग्रह नहीं होता है. किंतु मादर सूक्ष्मादि अवस्थाकोही भवसंसार कहना चाहिये. जीवकी अवस्थाको मब कहते हैं. इस भवमें उत्पन्न हुए संसारीके ३. भेद हैं. पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति इनके प्रत्येकके गदर, सूक्ष्म, पर्याप्तक और अपर्याप्तक ऐसे भेद होनेसे मिलकर बीस भेद होते हैं. दीद्रिय, वींद्रिय, चतारांद्रिय, संज्ञिपंचेंद्रिय, असंझी पंचेद्रिय इनके पर्याप्त और अपर्याप्त के मेदसे दस भेद होते हैं. दूसरे आचार्य भवपरिवर्तनका स्वरूप इस प्रकार कहते हैं-नरकगतिमें सबसे जघन्य आयुष्य दस हजार वर्षका है. उस आयुष्यसे कोइ जीव पहिले नरकम उत्पन्न हुआ. आयुसमाप्तिके अनंतर संसारमें भ्रमण कर पुनः पूर्वोक्त आयुरोही बह जीव उसरी नरकमें उत्पन्न होता है. इस प्रकार दस हजार वर्षके जितने समय होते हैं उतनी बार पहले नरको पूर्वोक्त आयुका धारक होता है. आयुसमीप्त के अनंतर संसारमें भ्रमण कर उसी नरकमें फिर उत्पन्न होता है परंतु अबकी बार एक समयाधिक दसहजार वर्षका आयुष्य उसको प्राप्त होता है. इस प्रकार एक एक समय वृद्धिंगत होते २ इस जविने तेहतीस सागरोपम आयुष्यातक असंख्यात बार जन्ममरण किया है. तदनंतर सप्तमनरकसे निकल कर यह जीव तिथंचगतिम उत्पन्न होता है. वहां उसका जघन्य आयुष्य अन्तर्मुहर्त प्रमाण का होता है. पूर्वक्रम के अनुसार तीन पल्योपम आयुष्य समाप्त किया. तदनंतर मनुष्यगतिमें भी उत्कृष्ट तीन पल्योपम आयुग्यतक तिम्गतिके समानही क्रम जानना चाहिए. देवमातमें नरकगतिके समानही क्रम जानना चाहिये. परंतु इतनी विशेषता है--देवगतिमें एकतास सागरोपम आयुध्य की समासि होनेतकही भवपरिवर्तन हैं. ये सर्व परिवर्तन इस जीवके अनंतवार हो चुके हैं, KARMERSEARS SHRISTOTRACT
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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