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________________ मूलाराधना १५०७ तस्य । मानधना हि मम धीरतां द्रष्टुं इमे महद्धिकाः समायाता यद्यप्येषां पुरो वेदनायाः प्राणा यांति कामं यांतु । तथाप्य मनस्वितां न चामीति स्तभ्यमानो दुःख सहते ॥ अर्थ - हे क्षपक ! राजा वगैरह श्रीमान लोक तेरी सल्लेखाना देखने के लिये आये हैं ऐसा कहकर अभिमानी क्षपकको मान उत्पन्न कर कवच करना चाहिये. अर्थात् जब राजादिक श्रीमान् पुरुष क्षपकदर्शन करनेके लिये आते हैं तब उस क्षपककी अभिमानप्रशंसा करनी चाहिये. मेरी चढ़ता तथा धैर्य देखनेके लिये ये राजादिक पुरुष आये हैं इनके आगे मेरे प्राण चले जावे तोभी कुछ परवाह नहीं है. मैं अपना मान नहीं छोडूंगा. दुःख सहकर भी मैं अपने अतका नाश नहीं करूंगा ऐसे भाव क्षपकके मनमें राजादिकोंको लाकर उत्पन्न करने चाहिये. माइकवचं भणिदं उस्सग्गियं जिणमदम्मि ॥ अववादियं च कवयं आगाढे होइ कादव्वं ॥ १६८० ॥ इत्येष कोsयाणि संशेण गोपितः । विशेषेणापि कर्तव्यो दुःखे सति दुरुतरे ॥ १७४६ ॥ विजयtter- बेमादिकवचं भणिदं इत्येवमादिकः कचखः कथितो जिनमते । उस्सग्गिगो औत्सर्गिकः सामान्यभूतः । अषवादिगं कवचं काव्यं विशेषरूपोऽपि कवचः कर्तव्यो भवत्यागादे मरणे ॥ एवं दूर मरणश्य सामान्यरूपतया प्रबंधेन कवचमभिधाय निकटमरणस्य तं विशेषरूपतया विधेयमनुशास्तिमूलारा --- उत्सग्गियं सामान्यभूतः । अथवादियं विशेषरूपः । तत्कालोत्पन्नध्यानांत राय नि मिचक्षुदादिदुःखनिराकरणोपायतया यथायथं प्रयोज्य इत्यर्थः । अगाढे आसन्नमरणे || अर्थ --- इस प्रकार श्रीजिनमतमें कवचका औत्सर्गिक सामान्यस्वरूप कहर है. तथा जब आगाढमरण प्राप्त होता है तब विशेषरूप कवचभी करना चाहिये. जह कवचेण अभिज्जेण कवचिओ रणमुहम्मि सत्तूर्ण || जाय अलंघणिज्जो कम्मसमत्यो य जिणदि य ते ॥ १६८१ ॥ आश्वास 19 १५००
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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