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________________ लाराधना आश्वासा रत्मसंभृतपावस्था वाणजःसागर यथा ॥ पत्तन निकषा साधो ' निमज्जति प्रभादतः ॥ १७३९ ।। बिज योदया--जह वाणियगा यथा वणिजो रत्नसं पूर्णामिभिः सह विनश्यति । समुद्रजलमध्य प्रमादन मूढाः पत्तनांतिकमागता अपि ॥ सम्यककृतशरीरसदेखनावतां संस्तरसंपवतामपि राद्वेषादिभावपरिप्रहापहिणामसमाधिकरणं स्यादिति प्रांतपुर:सरं समाधिभरणार्थिनमनुस्मरवि-- मूलारा-पमादमुढा निद्रादिना प्रमादेन तुर्वातमहामत्स्यचौरावित्रिनिपातमानतेवर्यतः (१) विषति मरणांता विपदमासादयति । रत्नपूर्णाभिनौमिः सह ।। अर्थ---जैसे नौकासे देशांतरमें जाकर व्यापार करनेवाले वैश्य रत्नोंसे भरी हुई नौकाके साथ शहरके समीप आकर भी प्रमादवश होनेसे समुद्रमें इनकर मरते है वैसे Sta सल्लेहणा विमुहा केई तह चेव विविहसंगहि ॥ संथारे विहरंता वि संकिलिश विवज्जति ॥ १६७४ ॥ तथा सिदिसमीपस्थाः शुद्धसस्तस्यायिनः॥ निपतंति भयावर्ते जीवाः संफ्लेशयोगतः ।। १७१० ॥ विजयोदया-सलेपणा विसुद्धा शरीरसलेखनाभावात् । संलचनया विशुद्धा अपि संतः। पूर्व केचित् वियि. घसंगहि विधिौरागद्वेषायिभावपरिग्रहः सह । सबारे विहरता पि संस्तर प्रवर्तमाना अपि । संविलिथा विवजनि संक्लिष्परिणता विनश्यन्ति ॥ मूलारा-सहना बिसुद्धा वि सम्यकृशीतपुपोऽपि । विविधसगेदि। विचित्र रागद्रषादिभावपरिग्रहे। सह । संकिलिट्टा आरौद्रध्यानाभ्यामाविष्टाः ।। अर्थ-शरीरसलखना तो जिनकी निरतिचार हो रही है परंतु मन में विचित्र संगद्वेषादिरूप भावपरिग्रह निवास करते हैं ऐसे मुनि कषायपल्लेख ना की शुद्धे नहीं होनेमे मस्तरमें आरूढ होनेपर भी संकेश परिणामांस क्लेशित होकर संसारसमुद्र में डूबकर मरते हैं. PRARA
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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