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________________ लागवना आवास विजयोदया-णिरपसु. नरकेषु । पदेणाओ वेदना भगोषमायो अनुपमाः। हारश्या वेदनाया जगत्यन्यस्था अभावात् । असादाबुलाओ, ससबोधकर्मबहुलाः । कारणबलस्खेम कार्यानुपरतिराग्याता । काणिमिश पत्तो शरीरनिमिसासंयमार्जितकर्मेनिमिसत्यान्मूलकारणं निर्दिष्ट कायनिमित्तमिति । अणंतसो अर्थतवारं । सं भवान् बहुविधामो १५२९ बहुधाः॥ तो नरकदुःस्वानुपिंतने वाथानामेकानविंशत्या आपके व्यापारयति मूलारा-अणोत्रमाओ अनुपमास्तादृश्याः पीडायात्रिषु लोकेअपि अन्यस्या अभावाम् । असादयतुल ओ असदेचकर्मोदयमर्थन निरंतर प्रवर्तमांना इत्यर्थः । प्राणिमित्तं शरीररक्षानिमित्तासंयमार्जितकर्मनिमित्तत्वात्तासी मूलकारणसापनार्थ इदं । पश्तो प्रातस्त्वं जीवं इति वा । बहुविधाओ उष्णशीतनरकादिकारणनानास्वादनेकप्रकाराः ॥ अर्थ--नरकमें तुमने ऐसी तीव्रवेदनाओंका अनुभव लिया है कि जगतमें अन्यत्र कहीं भी ऐसी वेदनायें नहीं है. : असाता बेदनीय कर्मका बहुत काल तक तीन उदय होनेसे नरकमें सतत दुःख भोगना पड़ता है. हे क्षपका शरीरके निमित अर्थात् शरीरके मोहमें पड़कर तू असंयमी हुआ था, इससे तेरे को दीर्घकालीन असाताकर्मका बंध हुआ था. अनंत भवों में इस कर्मके उदयसे तूंन दुःख भोगा है. उष्णनरकेषु उष्णमहत्तासूचनाधोंत्तरा गाथा जदि कोइ मेरुमचं लोहण्डं पक्खविग्ज णिरयम्मि ॥ उण्हे भमिमपत्तो णिमिसेण विलेज्ज सो तत्थ ॥ १५६१ ॥ क्षिप्तः श्वभ्रावनी क्षिप्रं मेकमात्रोऽपि सर्वथा ॥ उष्णामुर्चीमनासाद्य लोहपिंडो चिलीयसे ।। १६२२ ।। विजयोदया–णिरयम्मि उगह लोहगढ़ मेरुमत्तं जदि कोह पक्खिवेज्ज उष्णनरके लोपिंड मेरुसमानं यदि कश्चियो दानघो षा प्रक्षिपेत् । सो तत्थ भूमिमपत्तो उघ विलेज्ज लोहपिंडो भूमिमप्राप्त एष सुघतामुपयाति । उहण उन्णेन नरकबिलानां ॥ मारकाणामुमदुःखनिमित्त मुष्णत्त्वमहत्वमुपपरिकल्पनया ल्यापयति मूलारा-कोई कश्चिदेवो दानवो वा । लोडेड लोइपिंड 1 उण्हे उषणे प्रकृत्या । आर्षत्वादुष्ण मिति बा। भूमिमपतो भूतलममाप्यवेत्यर्थः । णिमिसेण निमेषमात्रकालेन । विलेज द्रवीभवत् ।। १४२९
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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