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________________ पुलाराधना १४२४ अर्थ — दंश और मशकों मक्षण किया गया विद्युच्चरनामक मुनि तीव्र वेदनाओंको सहकर रत्नत्रयारा धनाको प्राप्त हुआ. हणिपुरगुरुदत्तो सम्मलिथाली व दोणिमंतम्मि || उज्झतो अधियासिय पडिवण्णो उत्तमं अहं ॥ १५५२ ॥ वास्तव्यो हास्तिने धीरो द्रोणीमतिमहीधरे ॥ गुरुदत्तो यतिः स्वार्थ जग्राहानलवेष्टितः || १६१२ ॥ विजयोदयादरियापुर गुरुदत्तो हास्तिनापुरवास्तभ्यो गुरुदत्तः । संबलियालीय हरितसंकोश निरामा [?] पूर्णभाजनं सपत्रविहितमिदं अधेमुख संस्थाप्य उपरिभाजनस्य अग्निप्रक्षेपः संयलीत्युच्यते ॥ तद्वच्छिरसि निशितानिः । दोणितम द्रोणीमत्पर्वते दह्यमानः प्रपन्नः उत्तमार्थ ॥ मूलारा--इणिपुरगुरुदतो हास्तिनं पुरं यस्यासौ हास्तिनपुरी हास्तिनागपुरस्वामी सचासौ गुरुदत्त स मुनिः सन् । संबलिथालीए शिवपूरितममच्छादितमधोमुखभाजनं सर्वत्राप्रिसंवेष्टितं संलिस्थाळीत्युच्यते ॥ दोतम्सि द्रोणिमति पर्वते । अधियासिय नहाइवेदनां सहित्वा ॥ अर्थ- हस्तिना नगरके गुरुदच नामक मुनि द्रोणिमति पर्वतपर तप करते थे. कोई दुष्टने संभली थाली के समान उनके मस्तकपर अग्नि रखकर जलाया था. उसकी घोर वेदना सहकर वे रत्नत्रयको प्राप्त होगये. मी के भाजनमें वालकी फली भरकर चारों तरफ आंकके पत्ते भरना चाहिये अनंतर उस भाजनका मुंह नीचे करके उसके चारो तरफ आग्न लगा देना चाहिये इसको ही संभलीबाली कहते हैं. गाढप्पहारविद्धो पूइंगलियाहिं चालणीव कदो || त विय चिलादपुत्त पडिवण्णो उत्तमं अहं ॥ १५५३ ॥ गाढमहाविद्धोऽपि कीटिकाभिरनाकुलः ॥ स्वार्थ चिलान पुत्रोऽगाच्चालनीकृतविग्रहः ॥ १६१३ ॥ विजयोदया - गाढप्पहारविद्धो नितरामायुधैर्विद्धः । पूरंगलियाहिं कृष्णैः स्थूलोतमगैः पिपीलिकाभिः । चाणीव कशे चानीय कृतश्चिलातपुत्रस्तथाद्युत्तमार्थमुपगतः ॥ ---- वस ७ १४२४
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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