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________________ पलाराधना १४२१ कोसंबीललियघडा बूढा इपूरएण जलमज्झे आराधणं पण्णा पावोवादा अमूढमदी || १५४५ ॥ चंपा मासखमणं करितु गंगातडम्मि तहाए | घोरा धम्मघोसो पडिवण्णो उत्तमं ठाणं || १५४६ ॥ मासोपवाससंपनचं पायां सृज्वरार्दितः ॥ धर्म पुनः प्रामः स्वार्थ गंगातीरे ॥। १६०६ ॥ विजयोदय-चंपा नेपानगर्यो। मासखवणं करितु मासोपवासं कृत्वा । गंगातम्मि गंगायास्तटे । तच्छाए घोराय तृष्णया तीयया वाधितोऽपि । धम्मघोसो धर्मघोषः । उत्तमार्थ प्रतिपन्नः । मूलारा--कोसंबी कौशांच्यां नगर्यो । ललिदुपडा ललिताः सुखवर्द्धिता: इंद्रदत्तादयो द्वात्रिंशदिभ्याः श्रावकाः तेषां घटाः समुदायाः । णदिपूरगेण यमुनाप्रवाहेण । पाओबगदा प्रायोपगमनमरणं प्राप्ताः । एवं श्रीविजयो नेच्छति ॥ मूलारा -- मामत्रमणं मासोपवासं । करिंतु कृत्वा ॥ अर्थ -- कौशांबी नगरी में ललित घट नामके सुनिओंका समुदाय नदीके प्रवाहसे बह गया तो भी संक्लेश परिणामके वश वह नहीं हुआ नात्पर्य- सुखसे जिनके दिन व्यतीत होगये थे ऐसे इंद्रदत्तादिक बत्तीस श्रीमंत वैश्यपुत्र थे. उन्होंने दीक्षा लेकर यमुना नदी के तटपर तप किया, एक दिन वे सब यमुनानदी के प्रवाहसे वह गये परंतु रत्नत्रय में स्थिर रहकर उन्होंने प्रायोपगमन मरण प्राप्त कर लिया. चंपानगरी में एक महिनाके उपवास करके गंगानदीके किनारेपर तीव्र प्यास से पीडित होनेपर भी धर्म घोष मुनिराजने असंक्लिष्ट परिणामोंसे उत्तमार्थ प्राप्त कर लिया. सीदेण पुव्ववइरियदेषेण त्रिकुच्चिएण घोरेण ॥ संततो सिरिदत्तो पडिवण्णो उत्तमं अहं ।। १५४७ ॥ आश्वासः ७ १४२१
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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