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________________ पलाशवना १४०८ अर्थ- सर्व संघके समक्ष परीपह और उपसर्ग आनेपर भी मैं प्रत्याख्यात आहारादिक पदार्थों को स्वीकार न करूंगा ऐसी प्रतिज्ञा लेकर परषिहादिक आतेही कोनसा साधु दुःखी होकर स्वप्रतिज्ञाका त्याग करेगा ? अर्थात् अपनी प्रतिज्ञामें परीपहार्दिक आनेपर भी दृढता धारण कर उसको नम्र न करेगा आवडिया पडिकूला पुरओ चेव कर्मति रणभूमिं 11 अवि य मरिज्ज रणे ते ण य पसरमरीण बठ्ठेति ॥ १५२० ॥ प्रविशति रणं पूर्व शत्रुमर्दनलालसाः || - यच्छन्ति नासुनाशेऽपि शत्रूणां प्रसरं पुनः ॥ १५८१ ॥ विजया - आदिदा पत्रिकूला अभिमुखायाताः शत्रयः पुरखो सेव कर्मति रणभूमिं पुरस्तादेषोपसर्पति रणभूमि अधि य मरिन रणे यद्यपि रणे नियन्ते । ण य पसरमरीण बन्ति मैव प्रसरमरीणां वर्धयन्ति ॥ मूला --- आवडिव पडिकूला आपतिता अभिमुखा जाताः प्रतिकूलाः शत्रवो येषां सुभटानां ते पुरदो चेष पूर्वमेव शत्रुभिराक्रांतमेवेति भावः । क्रति आक्रामति । रणभूमिं युद्धाय कल्पितां भुवं । मरेज्ज म्रियेरन् । पसरं उत्साहं | यति वर्धयति । अर्थ -- हल्ला करनेवाले शत्रु युद्धभूमीमें आगे आगे ही पैर बढाते हैं कदाचित् युद्धमें शत्रु प्रहारसे मरणको स्वीकार करेंगे परंतु अपने प्रतिपक्षीका उत्साह बढेगा ऐसा कार्य वे कदापि नहीं करेंगे अर्थात् रणभूमीसे पलायन नहीं करेंगे. तह आवडिदप्पडि कूलदार साहू विमाणिणो सूग || अतिव्यवेणाओ संति ण य विगडिमुवयांति ॥ १५२१ ।। मानिनो योगिनो धीराः परीषहनिपूदिनः || सहन्ते वेदना घोराः प्रपद्यन्ते न विक्रियाम् ।। १५८२ ।। विजयोदया - तद् आवद्द पडिकूलदार तथा भापत्प्रतिकूलतया । साधयो मानिनः शूराः । अदितिव्यवेषणाओ अतीष सीमवेदनाः । सहति सहते । ण य विगडिमुवति नैष विकृतिमुपयति ॥ आश्वासः ی १४०८
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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