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________________ फुलाराधना आश्वासः १४०१ गंभीरं मधुरं स्निग्धमादेयं हृदयंगमम् ॥ सूरिणा शिक्षणीयोऽसौ प्रज्ञापनपटीयसा ।। १५७५ ॥ विजयोदया-गिद्ध स्नेहसहित, मधुरं श्रोत्रप्रिय, हदयसुखविधानि, हत्यप्रवेशि, अस्वरितं असौ शिक्षयितव्यः झपका प्रज्ञापयता॥ मूलारा-तो सीहावेदव्यो शिक्षयितव्यः । पण्णावतेण स्निग्धाविगुणयुक्तं वचनं वदता गणिना ।। अर्थ-निर्यापकाचार्य क्षपकको प्रेमसहित, कर्णप्रिय, हृदयको सुख देनेवाला, हृदयमें प्रवेश करनेवाला. ऐसा उपदेश करे, रोगादंके सुविहिद त्रिउलं वा वेदणं धिदिवलेण !! तमदीणमसंमूढो जिण पञ्चूहे चरित्तस्त ॥ १५१५ ।। संतोषयलतस्तीवास्ता रोगान्तकवेदनाः ।। अकातरो जघामूडो वृत्तविघ्नं च सर्वथा ॥ १५७६ ।। बिजयोदया-रोगांतक महतोल्पांच व्याधीन् । विपुला वा वेदनां घृतिबलन जय त्यमदीनोऽमुढइन्च प्रत्युहाम चारित्रस्य । वीतरागकोपता हि चारिवं । तयाधिप्रतीकारार्धेपु आदरवतो वेदनासु च द्वेषयतो नश्यति । ततश्चारित्रविघ्नास्यया जेतच्या इति भावः ॥ दु:खनिवारणी शिक्षा कब चापरनाम्नीभितः प्रबंधेनाभिधसे---- मूलारा-गोगातके अल्पान्मद्दतश्च व्याधीन । पच्चूहे विघ्नान । वीतरागकोपता हि चारित्रं तद्वयाध्यादिप्रतीकारार्थ बस्तुपु आदरबतो व्याध्यादिषु वेपवतच नश्यति ।। अर्थ-ई अपक! न दीनता को छोड़ कर मोहका त्याग कर अल्प और बडे दोनों प्रकार के व्याधिओं को तथा वेदनाको धैर्यके बलसे जीतले. चारित्रके जो शत्रु हैं उनको भी तू जीतले. राम और कोपसे अपने आत्माको अलग रखनाही चारित्र है. रोगका नाश करनेवाले पदार्थों में जो आदर करता है और वेदनाओमें जो देप रखता है उसका चारित्र नष्ट होता है. अतः चारित्रके विघातक पदाथोंको जीतना योग्य हैं.
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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