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________________ मूलाराधना। आश्वास । वैयाघृत्यगुणाः पूर्व कथिमा ये मपंचतः ॥ नेपक्षापरी नीचस्त्यज्यते निखिलैरपि ॥ १५५६ ॥ विजयोन्या-वेज्जायचरस गुणा वैयावृत्यम्य गुणा ये व विस्तरेण व्याख्यानानन्यः प्रच्युतो भयति उपेक्षते क्षप॥ आराधकबाधामप्रति कुर्वतः स्वार्थभ्रशोऽपि स्थादित्याहमूलारा--पुब गानुशिष्ये गुणपरिणामो इत्यादिना । तेलि फिटिदो तेभ्यश्च्यतः ॥ अर्थ-- रायके का निस्तारसे पूर्व में वर्णन किया है, जो क्षपककी उपेक्षा करता है वह उन गुणोंसे भष्ट होता है. अर्थात् सपककी उपेक्षा करनेसे क्षपक संसारसपद्मे हुयेगा और उपेक्षकके भी गुण नष्ट होंग उसके वात्सल्यादि गुणोंका नाश होगा. तो तरस तिगिछा जाणएण खवयस्स सव्वसत्तीए । विज्जादेसेण बसे पडिकमै होइ कायचं ॥ १४९७ ।। वैयावृत्य ततः कार्य चिकित्सां जानता स्वयम् ।। वैयोपदेशप्तश्चास्य शक्तितो भक्तितः सदा ।। १५५७ ॥ विजयोत्या-सो तस्स तसस्सस्य क्षपकस्य चिकित्सा जानता सर्वशक्त्या प्रतिकर्म कर्तव्यं वैचस्प चोपदेशेन । एवं क्षपकोपेक्षणे क्षतिप्रदर्शनाद्वैयावृत्ते निर्यापनाचार्य नियुक्ते-- मूलारा--मो प्रणिधानस्वार्थभंशादेतोः । तस्स तिगिंछाजाणारय तस्य संबंथिनी चिकित्सा स्वयं धैयोपदेशेन या जानता निर्यापकाचार्येण सपठिकम्मं तस्त्र प्रवीकार: कार्य इति संबंधः ॥ अर्थक्षपकके रोगका निदान जाननेवाले यनीने वैद्यके उपदेशानुसार अपनी सर्व शक्तीमे उसके रोगका परिहार करना चाहिये. णाऊण विकारं वेदणाए तिस्से करेज पडियारं ॥ फासुगदव्वेहि करेज बायकफपित्तपडिघादं ।। १४९८ ।।
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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