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________________ पृलागवना रत्नत्रयपूणो नौरिष समुनमध्ये ॥ आश्वास तदनोदयात्सद्ध धानविनाशेन दुर्थ्यानावेशात्साधुचिराध्य रत्नत्रयं मृतो घोरे संसारसागरे निमजतीति पर्शयति-- मूलाग-दिणावा रागिनोंः । पोत इव यत्नतः प्रणेयन्यादाश्रिताना नारकत्वाच । भिजदि देववशाद्विघटते । यनिभाचं नौमात्र मुंचनीयर्थः । अर्थ-यह यतिरूप नीका हजारो गुणोंस भरी हुई है कदाचित मयंकर संसारसमुद्र में डूब जायगी. तात्पर्य व्रत, शील, समिति मुनिः रत्नत्रय इत्यादि गुणोंस भरी दुई क्षपकरूपी नौका रोगवेदनासे डूबनेका प्रसंग आनेपर उस बचाना चाहिय. गुणभरिदं जदि णावं दहण भवोदधिम्मि भिज्जंतं ॥ कुणमाणो हु उवेक्खं को अण्णो हुज णिद्धम्मो ॥ १४९५ ।। निमज्जतं भवाम्भोधौ यो रष्ट्रा तमुपक्षत ।। अधार्मिको निराचारो नापरी विद्यते ततः ॥ १५५५ ।। विजयोदया-गुणभरिब जवि गावं गुणैः पूर्णा यतिना भवसमुद्रमध्ये भिधमान हष्ट्वा यः करोत्युपेक्षा तस्मात्कोऽन्यो मवेधर्मनिक्रांतः॥ आराधकस्य समाधिविनाकारणमप्रतिकुर्वाण प्रणिति-- मूलारा-कुणमाणादो कुर्वाणान । उबेख दुर्दैवोदयजन्यमानशूलादिपीडाप्रतीकाराभावं ॥ अर्थ-गुणोंसे परिपूर्ण यनिनौका यदि भवसमुद्रमै फूटती दुई देखकर जो उसकी उपेक्षा करता है उससे जगतमें अन्य अधार्गिक कोन होगा? वेज्जाबच्चस्स गुणा जे पुव्वं विच्छरेण अक्खादा ॥ तेसि फिडिओ सो होइ जो उवेक्खेज्ज त खवयं ॥ १४९६ ॥ १३९३
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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