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________________ आश्वासः मूलाराचना पलालेरिव निःसारेबहुभिर्भाषितः किम् ॥ प्रत्यूहकरणे शक्तो न मे शक्रोऽपि निश्चितम् ॥ १५५६ ॥ विजयोदया-जिपिपण बहुणा किंबहुना जमिपतन देवा अपि शतमखममुखा मम घिनं कर्तुं असमर्थाः भवत्पादोपग्रहणगुणेन ॥ आराधनानियहणासौमनकाष्ठामातिष्ठते-- मुलास--सइंदिया शतमुखप्रमुखाः । पादायग्गाहणेज पादप्रसादानुग्रहण । ण तरिहंति न समर्था भविष्यति ॥ अर्थ--अधिक बोलनेसे क्या मतलसहित क्षेत्रासापळे नागरहोपा लिग करने में असमर्थ होते हैं. - - किं पुण छुहा व लण्हा परिस्समो वादियादि रोगो वा ॥ काहिति झाणविग्धं इंदियविसया कसाया वा ॥ १४८७ ।। ध्यानविघ्नं करिष्यति किं क्षुदादिपरीषहाः ।। कषायाक्षाद्वषो था मे त्वत्प्रसादमुपेयुषः ।। १५४७॥ विजयोदया-कि पुण किं पुनः कुर्वन्ति ध्यानस्य विनं क्षुधा या, तृपा घा, परिश्रमो या, धातिकादिरोगोधा, पा द्रियाणां विषयाः, कषाया था। मूलारा--वादियादि वाहिकपैतिकश्लष्मकाधि । काहिंति मनागपि न करिष्यसि इत्यर्थः ॥ अर्थ- क्षुधा, प्यास, पारिश्रम, वातादिकसे होनेवाले रामे, इंद्रियोंके विषय और कषाय ये सब मेरे ध्यानमें विघ्न कैसे कर सकेंगे. इंद्रादिक देव भी मेरी आराधनामें पाधा लानेमें असमर्थ हैं फिर ये क्षुद्र उपद्रव मेरा क्या नुकसान कर सकते हैं? १३८८ ठाणा चलेज मेरू भूमी ओमच्छिया भविस्सिहिदि ॥ प्रा य हं गच्छमि विगदि तुझं पायप्पसाएण ॥ ११८८ ।।
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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