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________________ मूलाराधना आश्वास अर्थ-जैसे पानकका माशन कर प्यासा हुआ मनुष्य आनंदित होता है वैसे नियापकाचर्यके उपदेशामृत पानकको पीकर अंतःकरण प्रसन्न होनेसे यह अपफ खूब संतुष्ट होगया. तो सो खवओ तं अणुसढि सोऊण जादसंवेगो ॥ उद्वित्ता आयरियं वंदइ विणएण पणद्गो ॥ १४८०॥ सोऽम अकर्ष शुट वा सविनमानमः ॥ उत्थाय बंदत भूरि स नवीकृतविग्रहः ॥ १५४० ॥ विजयोदया-तो सो स्रयगो ततोऽसी झपकः तदनुशासनं श्रुत्वा जातसंवेग उत्थाय आचार्य चंदते विनयेन प्रणताकः॥ नदनुशिष्टिश्रवणोत्पन्नधर्मतत्फलदर्शनानुरागेण अपकेण विधेयां निर्यापकाचार्यसपर्याचयां दर्शयति-- मूलारा--तं तां अर्थ-आचार्यका उपदेश सुनकर जिसको धर्ममें अतिशय श्रद्धा हुई है ऐसा वह क्षपक नम्र होकर, ऊठकर आचार्यके चरणोंको विनयस चंदन करता है. भंते सम्म गाणं सिरसा य पडिग्छिदं मए एवं ॥ जं जह उत्तं तं तह काहेत्ति य सो तदो भणइ ॥ १४८१ ।। तवेमा देशनां कृत्वा शंषामिव शिरस्यहम् ।। यतिमाचरिष्यामि पराजितपरीषहः ॥ १५४१ ।। दिययोदया-भंचे सम्म णाणं भगवन् सम्यज्ञानं पंडिरसा मया परिगृहीतं । यद्यथोक्तं भवद्भिस्तथा करिष्यामि इति वदति ॥ वंदनानंतरफरणीय क्षपकस्य गुरेरमे शासनस्वीकारपुरःसरं तदर्थानुष्ठान प्राप्तिकाक्रममाइ मुलारा--भते भगवन् ! अणं आज्ञो । एवं इयं । काहेति करिष्यामीति ।। १७४
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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