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________________ मूलारावना आश्वासः १२८२ लंधिज्जतो अहिणा पासुत्तो कोइ जग्गमाणेण ॥ उठविदो त घेत्तुं इच्छदि जध कोदुगहलेण ।। १३२३ ।। लंध्यमानोऽहिना सुप्तो जाग्रतोत्थापितो यथा ॥ कौतुकेन तमादातु कश्चिदिच्छति मूदधीः ॥ १३७१ ।। विजयोदया-लेधितो अहिणा लेयमानोऽहिना, कोर पासुसो कश्चित्प्रसुप्तः, जग्गमाणेण उट्ठविदो जाग्रता उत्थापितः। उह ने रोतुमिच्छति यथा सग्रहीतुमिच्छति, कोढगहण कौतूहलेन ॥ मलाग-पामुत्तो निर्भरनिद्राकान्तः || अर्थ-जिसके ऊपरसे सर्प जारहा है ऐसे सोये हुए किसी मनुष्यको किसीने जगाया पर जगकर उठे हुए उस मनुष्यने उसी सपको कौतुकसे पंकहना चाहा वैसे कोई गृहस्थावस्था संसारका कारण है ऐसा समझकर उसो त्यागकर फिरभी उसीको स्वीकारता सयमेव वतमसणं जिल्लज्जो णिग्धिणो सयं चेव । लोलो किविणो भुंजदि सुणो जध असणतण्हाए ॥ १३२४ ॥ स्वयमेचाशनं यांतं निर्मज्जो निघणाशयः ॥ सारमयो यथासासि कृपणोऽशनतृष्णया ॥ १३७२ ॥ विजयोक्यान्सयमेव तमसणं स्वयमेष यांतमशनं सुणहो णिलज्जो णिग्घ्रिणो श्वा निलाजः मिर्पणः 1 जहा यथा । सयसेच मुंजलि स्वयमेय भुक्ते । लोलो अशक्तः। किविणो कृपणः असपातण्डार अशमतपणया। मुलारा-यंत छर्दिम् । किविणो कृपणः ।।। अर्थ-जैसे निर्लज्ज और जुगुप्सारहित कुत्ता स्वयं किया हुआ वमन स्वयं ही अबकी इच्छासे भक्षण करता है. कृपण और अनमें आसक्त कुत्ता स्वयंका रमन किया हुआ अन्न स्वयं खाने लगता है. एवं केई गिहवासदोसमुक्का वि दिक्खिदा संता ।। इंदियकसायदोसे हि पुणो ते चेब गिफ्हति ॥ ११२५ ॥ १२८९
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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