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________________ मूलाराधना आम १२७१ अर्थ-कितनेक मुनि इंद्रियरूपी पोर और कपायरूप हिंस्र प्राणिओंसे जब पकडे जाते हैं तब साधुरूप ज्यापारिओंका त्याग कर पार्श्वस्थ मुनिके पास जाते है. तो साधुसत्यपंथं मंडिय धासम्मि णिज्जमाणा ते || गारवगहणकुडिल्ले पडिदा पाति दुक्खाणि || १९९७ ।। साधुः सार्थं परित्यज्य नीयमानो महाभयम् ।। सहते दारुणं दुःख प्राप्तो गौरवकाननम् ।। १३४२ ॥ विजयोदया-तो साधुसस्थपंथं साधसार्थस्थ पंथानांडिय त्यक्त्वा । पासम्मि पार्थे । गिज्जमाणाते नीयमानास्ते | गारय चिरऋद्धिरसासातगौर वसंछन्ने गहने । पडिदा पतिताः । पायेति प्राप्नुपन्ति | दुक्खाणि दुःखानि ।। Ji.- भारपिडिल्ले रिद्धिरससातगौरवनिबिलकंटकवान ।। अर्थ- मुनि साधुसार्थका मार्ग छोडकर पार्श्वस्य मुनिके पास जब जाते हैं तब ऋद्धिगर्व, रसगर्व और सातगर्व इनसे व्याप्त जंगलमें पडकर दुःख भोगते हैं. सल्लविसकंटएहिं विद्या पडिदा पडंति दुक्खेसु ।। विसकंटयविद्धा या पडिदा अडबीए एगागी ॥ १२९८ ॥ शल्यःकंटकैर्षिताः पतिता दुःखमासते ॥ एकाकिनोऽटची याता विद्धा वा विषकंटकैः ॥ १३४३ ।। विजयोदया-सल्लविसकटएहिं विद्या मिथ्यात्यभायानिदानशल्यकंटकैर्चा विद्धाः । पडिदा पतिताः । युक्वेसु पति दुःख पतति । विसकंटय विद्धा या अडची पगामी पड़िया व विषकंटकेन विद्धा अटभ्यामेकाकिनः पतिता यथा दुःषु पतंति तथैवेति दान्तिकयोजना ॥ मूलारा--बिद्धा दूषिताः । पडिदा चारित्राद्धष्टाः । एमागी असहायाः ।। अर्थ-जैसे विषरूप कंटकसे विद्ध हुए पुरुष जंगलमें अकेलेहि पड़कर दुःख भोगते हैं वैसे मिथ्यात्व,
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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