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________________ मूलाराधना इस शंकाका उत्तर ऐसा है-सुखके अभावमें भी जगत को सुखकी भ्रांति होरही है. यह उसका विपर्यस्त ज्ञान है. आश्वासः १२४७ Aad दीसइ जलं मयतहिया हु जहू बणमयस्स तिसिदस्स ।। भोगा सहं ब दीसंति तह य रामेण तिसियरस ।। १२५७ ॥ . कामिभिभॊगसथायामसत्यं दृश्यते सुखम् ।। कुरंगैर्मृगतृष्णायां पानीयं तृषितरिव ।। ३०१ ॥ . विजयोदयादीसा वणमयस्स निसिदस्स जहा जलं मयतपिया धन मृगेण हरिणादिना तुषामिभूने जलकांक्षायता जलमिव दृश्यते मृगतृरिणका न मा मगेग जलतयोपलव्धेत जलं भवति । तथा रागेण निसिदस्स भोगा सुदंब दीसंनि रागतृषितेन भीमाः सुखमिव दृश्यते ॥ मूलारा-वणमचम्म बनमगेण हरिणादिना अत्र तृतीयायाः पीवगायः। भोगा कामिन्यादिनिभीसाः, इंद्रिचप्रतीतकः। इसी विषयका स्पष्टीकरण अर्थ-जैसे जंगलमें विचरनेवाले हरिणों को तृषास पीडित होनपर मृगतृध्यिका जलके समान दीखती है. HEEL परंतु वह वास्तविक जलरूप नहीं है बैसे रागभावसे व्याकुल हुए इस जीवको भोगपदार्थ सुखमय दीखते हैं परंतु वे वास्तविक सुखरूप नहीं है. वग्यो सुखेज्ज मदयं अवगासेऊण जद मसाणम्मि ॥ तह कुणिमदेहसंफंसणेण अबुहा सुखायंति ॥ १२५८ ।। कुथितस्त्रीतनुस्पर्श नष्टबुद्धिः सुखायते ॥ अवगुख शयं व्याघ्रः श्मशाने किंन तृप्यति ॥ १३०२॥ विजयोदया-बग्यो सुखेज श्मशाने व्याम्रो मृतकमषनास्य तुप्यति यथा तथा कुपितदेवसंस्पर्शनेमावुधा जा सुखाधिगमहर्षनिर्भरांगा भवन्ति । . . SATARATARAreasokareewat १२४७
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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